आयुर्वेद – स्वतंत्रता पूर्व एवं पश्चात




आयुर्वेद मनुष्य जीवन के लिए वरदान व आशीर्वाद समान अमृत रूपी विज्ञान है । इसको अर्थवर्वेद का समीपस्थ वेद होने के कारण व उसकी समानता दर्शाने के कारण पंचम वेद (पांचवा वेद) भी कहा गया है । सृष्टि की उत्पत्ति करता आदिदेव ब्रम्हा द्वारा हजारों वर्षों पूर्व आयुर्वेद का ज्ञान पृथ्वी पर जनकल्याण हेतु प्रवृत हुआ एवं हमारे आचार्यों ने इस ज्ञान को लिखित रुप में संग्रहित कर मनुष्य जीवन के लिए आशीर्वाद प्रदान किया।  independence purn paschat

किंतु धीरे-धीरे समय के साथ इस महत्वपूर्ण ज्ञान का पतन होता चला गया । आयुर्वेद के ज्ञान के सीमित होने में अनेकोनेक कारण शामिल हुए । पुराने समय में गुरुकुल संप्रदाय एवं पद्धति द्वारा इस ज्ञान का प्रचार हुआ करता था।  लेकिन इस परंपरागत पद्धति के अंतर्गत गुरूजन अपने विशेष शिष्यों को अथवा पिता अपने पुत्रों को ही आयुर्वेद पढ़ाया करते थे | independence purn paschat

 प्रत्येक संप्रदाय अपनी एक विशेष शैली, औषधि योग आदि के लिए प्रसिद्ध हुआ करते थे जिसके कारण अन्य जगह उन्ही संप्रदाय विशेष पर निर्भर रहने लग जाया करता था | इस प्रकार पृथक – पृथक आयुर्वेद के अनुसरण द्वारा समाज के अन्य वर्ग इस ज्ञान को समझने व सीखने से वंचित रह गए|  आज भी केरल राज्य में अष्ट  वैध  संप्रदाय आयुर्वेद के ज्ञान के उसी परंपरागत तौर तरीकों का अभ्यास करता है | इस परंपरागत अनुसरण की कमी केवल यही रही की  अन्य वैद्य व समाज आयुर्वेद में उपलब्ध सिद्ध औषधि योग  व तकनीकों से वंचित होता चला गया एवं आयुर्वेद के ज्ञान का विकास व प्रचार बुरी तरह से प्रभावित हुआ | independence purn paschat




राजधानी में जुर्म थमने का नाम नहीं

समय के बीतते जब भारत में बुद्धिज़्म का आगमन हुआ तब आयुर्वेद का अधिक पतन होने लगा | सर्जरी व पंचकर्म जैसी महत्वपूर्ण शाखाओं को अहिंसा का रूप मान कर प्रतिबंधित कर दिया गया | मुग़ल राज्य के तहत आयुर्वेद प्रमुख रूप से खात्मा सा हो गया जब बहुत से आयुर्वेद के कीमती अनमोल ग्रन्थ नष्ट कर दिए गए | मुग़ल साम्राज्य के आक्रमण  के दौरान नष्ट हुआ आयुर्वेद का महत्वपूर्ण ज्ञान आज भी वापस नहीं किया जा सका | independence purn paschat

मुग़ल साम्राज्य के पश्यात जब भारत पर ब्रिटिश हुकूमत ने लगभग 100  साल राज किया तब उन्होंने भारत में मार्डन साइंस को बढ़ावा दिया जिसके कारण आयुर्वेद को और अधिक हानि का सामना करना पड़ा | लेकिन कुछ प्रांतीय शासकों ने अठाहरवीं शताब्दी के दौरान आयुर्वेद के महत्व को समझते हुए उसके अस्तित्व की फिर से नीव रखने पर विचार किया व इस समय आयुर्वेद को नव जीवन प्रदान करने हेतु अनेकोनेक प्रयास किये गए | independence purn paschat

1927 में भारत का प्रथम आयुर्वेद पाठ्यक्रम कलकत्ता के गवर्मेंट संस्कृत कालेज में आरम्भ किया गया | हालांकि इस पाठ्यक्रम को भी ब्रिटिश सरकार ने छः साल के बाद बंद कर आयुर्वेद के उगते सूरज को पुनः अस्त कर दिया | स्वतंत्रता से पूर्व इंडियन नेशनल कांग्रेस ने आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए अनेक प्रयत्न किये | 1907 में अखिल भारतीय आयुर्वेद सम्मलेन स्थापित किया गया जिसमें भारतीय चिकित्सा पद्धति के गुणी चिकित्स्कों को आमंत्रित किया गया | independence purn paschat




1916 में पंडित मदन मोहन मालवीय, श्री सुरेंद्र बनर्जी और सर गंगाधर चित्तनाविस ने सरकार पर दबाव डाला की भारतीय चिकित्सा सेवा को मान्यता प्राप्त हो व इसका वैज्ञानिक तौर  पर  विकास एवं उपयोग होने की और प्रयत्न किया जाना चाहिए | १९२० में इंडियन नेशनल कांग्रेस ने संकल्प किया व सरकार से आयुर्वेद के संरक्षण की मांग की ,जिसके तहत प्रांतीय सरकार ने आयुर्वेद को बढ़ावा देना शुरू कर दिया

तत्पश्चात 1924 से 1940 तक का समय आयुर्वेद इतिहास में सुनहरा समय साबित हुआ जब प्रांतीय राजाओं ने पुनः हमारे इस प्राचीन ज्ञान का संरक्षण करने हेतु भारत के बिभिन्न प्रांतों में अनेक आयुर्वेद कालेज स्थापित किये | 1924 -मद्रास आयुर्वेदिक कालेज , 1926 – पटना आयुर्वेदिक कालेज , 1926 – भारतीय चिकित्सा परिषद, 1927 – काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में विधिवत आयुर्वेद कालेज , 1946 – जयपुर में पृथक आयुर्वेद कालेज , 1954 – लख़नऊ  आयुर्वेद कालेज, 1956 – जाम नगर में प्रथम स्नातकोत्तर प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना हुई | इस आयुर्वेद के उदय की क्रांति पर त्रावणकोर , कोचीन , जाम नगर , मैसूर आदि राज्यों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया  |




उस समय स्थापित हुए आयुर्वेद कालेज आज तक कार्यरत है और जिनकी गिनती आज भी भारत के श्रेष्ट कालेज में होती है जैसे गुलाब कूबरबा आयुर्वेद कालेज, जाम नगर, तिलक आयुर्वेद महा विद्द्यालय , पुणे , ओल्ड महाराजा कालेज तरवां कोर (गवर्मेंट आयुर्वेद कालेज त्रिवेंद्रम ) स्वतंत्रता पश्चात भारतीय सरकार ने आयुर्वेद पद्धति के विकास की और विशेष ध्यान देना शुरू किया | 1959 में केंद्रीय आयुर्वेद एवं सिद्ध अनुसंधान परिषद की स्थापना हुई जिसके कारण आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को मजबूती प्रदान हुई |  1970 में सेन्ट्रल काउंसिल आफ इंडियन मेडिसिन एक्ट पारित हुआ व उसका कार्यान्यवन 1971 से चालु हो गया जिसके कारण आयुर्वेद के इस विस्तृत् ज्ञान को एक पाठ्यक्रम में व्यवस्थित करने में मदद मिली |

समय के साथ 1978 में आयुर्वेद के प्राचीनतम ज्ञान व औषधि यगों को मार्डन जगत से जोड़ने हेतु व वैज्ञानिक रूप से अधिक व्यवस्थित करने हेतु सेन्ट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंस  की स्थापना की गयी | तत्पश्चात 1988 में राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ की स्थापना की गयी जिसमें गुरु शिष्य परम्परा के तहत आयुर्वेदिक हिस्सों को भारत के विशेष गुरुजनों द्वारा आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करने का अवसर प्रदान किया जाने लगा |  इस कारण आयुर्वेद के परम्परागत औषधि योग व तकनीकों का प्रचार पूर्ण रूप से समाज में पुनः स्थापित होने में मदद मिली | 9 नवम्बर 2014 को भारतीय सरकार ने भारतीय चिकित्सा पद्धति को प्रोत्साहन देने हेतु व आयुर्वेद सहित अन्य विभाग जैसे योग, युनानी , होम्योपैथी का एक जुट विकास करने के लिए आयुष मिनिस्ट्री की गयी|  इस  कारण आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को एक विशेष बल प्राप्त हुआ है व अनेक वर्षों के संघर्ष के उपरान्त आयुर्वेद का भविष्य उज्जवल प्रतीत होने लगा है |

(डा. मीना तांदले – आयुर्वेदाचार्य )

कान में खुश्की और दर्द का अचूक औषधी