वट सावित्री की कथा एवम इतिहास history and story of vat savitri




धार्मिक ग्रंथो के अनुसार वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ माह में कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाता है। तदनुसार इस वर्ष 4 जून 2016 को वट सावित्री व्रत मनाया जाएगा। यह व्रत महिलाएं अपने सौभाग्य की कामना एवम संतान प्राप्ति के लिए करती है। भारतीय संस्कृति में वट सावित्री व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक माना गया है। विभिन्न धार्मिक पुराणो में इस व्रत के विषय में विस्तार पूर्वक बताया गया है।  history and story of vat savitri
वट सावित्री व्रत कथा
स्कन्द पुराण के अनुसार, भद्र देश के राजा अश्वपति की कोई संतान न थी जिस कारण राजा अश्वपति सदैव कुण्ठित रहते थे। तत्पश्चात उन्होंने अपने राज्य पुरोहित से इस संदर्भ में कोई माध्यम बताने का अनुरोध किया। राज्य पुरोहित ने कहा, हे राजन आप सावित्री देवी की पूजा करें। माँ सावित्री प्रसन्न होकर आपको मनोवांछित वर अवश्य देंगी। राजा अश्वपति ने संतान प्राप्ति के लिए कई वर्षो तक तपस्या की जिससे माँ सावित्री अति प्रसन्न हुई। माँ सावित्री ने प्रकट होकर उन्हें पुत्री प्राप्ति का वर दिया। तदोपरांत राजा अश्वपति के घर में पुत्री का जन्म हुआ। राजा अश्वपति ने माँ सावित्री के नाम पर अपनी पुत्री का भी नाम सावित्री रखा।
समय के साथ सावित्री बड़ी होती गई। सावित्री सब गुणों से सम्पन्न कन्या थी। जिस कारण राजा अश्वपति को सावित्री के योग्य वर नही मिल पा रहा था। कुछ समय पश्चात राजा ने सावित्री को स्वंय वर तलाशने के लिए कहा। सावित्री अपने वर की तलाश में एक वन में जा पहुंची जहां उसकी भेंट साल्व देश के राजा दयुम्त्सेन से होती है। दयुम्त्सेन का राज छिन्न गया था जिस कारण साल्व का राजा अपने परिवार सहित उसी वन में रहते थे। सावित्री ने जब राजा के पुत्र सत्यवान को देखा तो सावित्री ने उन्हें पति रूप में वरण कर लिया। यह बात जब महर्षि नारद को ज्ञात हुई तो उन्होंने इस सदर्भ में राजा अश्वपति को बताया कि आपकी कन्या को वर ढूंढने में भारी भूल हुई है। राजकुमार सत्यवान गुणवान तथा धर्मात्मा है परन्तु सत्यवान अल्पायु है एवम एक वर्ष पश्चात इनकी मृत्यु हो जाएगी। जिससे राजा अश्वपति पुनः चिंतित हो गए। उन्होंने अपनी बेटी सावित्री को समझाया कि कोई और वर चुन लो। तत्पश्चात सावित्री बोली, पिता जी आर्य कन्याए अपने पति का वरण सिर्फ एक बार करती है तथा कन्यादान भी एक बार ही किया जाता है। अब भगवान की जो इच्छा हो, मैं सत्यवान की ही अर्धांग्नी बनूँगी।

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तत्पश्चात राजा अश्वपति ने दोनों को परिणय सूत्र में बांध दिया। सावित्री ससुराल पहुंच कर सास-ससुर की सेवा में रत हो गयी। समय के साथ वो दिन भी आ गया जिस दिन राजकुमार की मृत्यु विधि-विधान के अंतर्गत सुनिश्चित थी। सत्यवान उस दिन भी जंगल में लकड़ी काटने चला गया। सावित्री भी अपने सास-ससुर से आज्ञा लेकर अपने पति के पास पहुंच गयी। सत्यवान वृक्ष पर चढ़ कर जैसे ही लकड़ी काटने लगा, तभी सत्यवान का सर चकराने लगा, वह तुरंत वृक्ष से नीचे उतर आया। उस समय सावित्री ने उसे अपने गोद में सुला लिया, तभी यम आकार सत्यवान के जीवन को लेकर जाने लगा तब सावित्री भी उसके पीछे-पीछे चल दी। यम ने मुड़कर सावित्री को जाने को कहा, सावित्री फिर भी चलती रही। तत्पश्चात यम ने कहा तुम्हे क्या चाहिए? मनवांछित फल ले लो परन्तु सत्यवान को जाने दो। वट सावित्री की कथा एवम इतिहास history and story of vat savitri

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