कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष





तुमसे तन-मन मिले प्राण प्रिय! सदा सुहागिन रात हो गई Special Krishna Janmashtami

होंठ हिले तक नहीं लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई Special Krishna Janmashtami

राधा कुंज भवन में जैसे

सीता खड़ी हुई उपवन में

खड़ी हुई थी सदियों से मैं

थाल सजाकर मन-आंगन में

जाने कितनी सुबहें आईं,शाम हुई फिर रात हो गई

होंठ हिले तक नहीं,लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

तड़प रही थी मन की मीरा

महा मिलन के जल की प्यासी

प्रीतम तुम ही मेरे काबा

मेरी मथुरा,मेरी काशी

हिन्दू राष्ट्रवाद की स्थापना

छुआ तुम्हारा हाथ,हथेली कल्प वृक्ष का पात हो गई

होंठ हिले तक नहीं,लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

रोम-रोम में होंठ तुम्हारे

टांक गए अनबूझ कहानी

तू मेरे गोकुल का कान्हा

मैं हूं तेरी राधा रानी

देह हुई वृंदावन,मन में सपनों की बरसात हो गई

होंठ हिले तक नहीं,लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

सोने जैसे दिवस हो गए

लगती हैं चांदी-सी रातें

सपने सूरज जैसे चमके

चन्दन वन-सी महकी रातें

मरना अब आसान,ज़िन्दगी प्यारी-सीसौग़ातही गई

होंठ हिले तक नहीं,लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

फ़िरदौस ख़ान

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