सामाजिक सरोकार और टीवी चैनल्स



आज हम एक बार फिर चैनल्स की खबरों की ओर ले चलते हैं। आज एकाएक खबरिया चैनल्स से सामाजिक सरोकार से जुड़ी खबरें गायब होती जा रही हैं। अब चैनल्स पर खबरों का स्तर इतना गिरता जा रहा है कि घटिया से घटिया खबर चलाने के लिए भी चैनल्स कंपटीशन करने लगे हैं। जिन खबरों का सीधा संबंध आम आदमी से होता है, उन खबरों को चैनल्स में ढूंढना टेढ़ी खीर बनता जा रहा है। खबरों का सीधा संबंध आम आदमी से होता है। indian govt constitution

खबरें आम आदमी को जागरूक करती हैं, उसे सार्थक सोच प्रदान करती हैं। लेकिन आम आदमी से जुड़ी खबरें अब टेलीविजन से गायब होती जा रही हैं। खुद सरकार का सूचना प्रसारण मंत्रालय भी इस बात को लेकर चिंतित है। लेकिन अपने खबरिया चैनल्स पर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा। कभी अपने खबरिया चैनल्स पर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा।

कभी आपने गौर किया कि कृषि, आविष्कार, शिक्षा, विज्ञान, ग्रामीण क्षेत्रों के विकास, राज्यों की मूलभूत समस्याओं, नक्सलवाद और क्षेत्रवाद जैसे मुद्दों पर खबरिया चैनल्स कितनी खबरें दिखाते हैं। अगर कुछ चैनल्स इस तरह की खबरें दिखाते भी हैं तो उनकी कितनी संख्या होती है और वह कितने बुलेटिन में दिखाई जाती है आज के दौर में टेलीविजन पर सबसे ज्यादा खबरें अपराध, राजनीति और उसके बाद मनोरंजन की होती हैं। रही सही कसर लॉफ्टर शो जैसे कार्यक्रमों की खबरों से पूरी कर दी जाती है। indian govt constitution

चैनल्स अपने को खुद ही अव्वल नंबर बताने पर तुले हैं

अब बताइए कि आम आदमी के सरोकार से जुड़ी खबरें कहां हैं। क्या आम आदमी से जुड़ी कोई खबर खबरिया चैनल्स के पास नहीं होती। इस सवाल का जवाब हां में है, होती तो हैं, पर उन्हें दिखाने की जहमत कोई चैनल्स उठाना नहीं चाहता। सब चैनल्स पूछने पर रटा-रटाया जवाब देते है कि इस तरह की खबरों की कोई खास वैल्यू नहीं होती और हमारे पास ऐसी खबरें आती भी कम हैं। अगर कोई स्टींगर कभी भूले-बिसरे इस तरह की खबर भेज भी देता है तो उसे बड़ी जद्दोजहद के बाद लगाया जाता है। इधर कुछ चैनल्स ने अपने बड़े बड़े रिपोर्टस को जासूस के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया है। indian govt constitution

हाल ही में घटित कुछ घटनाओं को रिपोर्टस ने जासूस के तौर पर कवर किया और पुलिस सहित दूसरी जांच एजेंसियों को वह वारदात खोलने के राज बताते रहे। बताइए इस तरह की खबरें हमें कहां ले जाएंगी। ऐसी खबरों पर अब सरकार ने भी रोना शुरू कर दिया है और खबरिया चैनल्स के लिए कोड ऑफ कंडक्ट बनाए जाने की बात होने लगी है। कुछ चैनल्स ने अपने को अभी तक सनसनीखेज, डरावनी नाटय रूपांतरित और भविष्य बताने वाली खबरों से बचा रखा है। लेकिन ऐसे चैनल्स बंद ही हैं। indian govt constitution

कहां कहां कृषि के क्षेत्र में नए नए शोध हो रहे हैं

खबरिया चैनल्स की इस भीड़ में आम आदमी अपने सरोकार से जुड़ी खबरों को देखना चाहता है, लेकिन उसे निराशा हाथ लगती है। देश में आजादी के बाद सभी क्षेत्रों में जमकर तरक्की की है और निरंतर कर भी रहा है। आज देश के सुदूरवर्ती क्षेत्र का किसान बढ़िया तकनीकी का इस्तेमाल अपनी फसलों के लिए करता है। देश में और कहां कहां कृषि के क्षेत्र में नए नए शोध हो रहे हैं, इन सब चीजों को जानने के लिए उसके पास टेलीविजन है। लेकिन जब उसे पता चलता है कि खबरिया चैनल्स ऐसी खबरों की जगह आसमान में भी यह बात लागू होती है। आम आदमी जिन खबरों को बहुतायत से प्रकाशित किया जाता है। indian govt constitution

क्या होता है पीई रेशियो

टेलीविजन चैनल्स के प्रारंभिक चरण में लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि अब अखबार के जमाने गए। अखबार अब अप्रसांगिक हो जाएंगे। लेकिन क्या ऐसा हुआ। आज खबरिया चैनल्स अखबारों को देखकर ही तीस फीसदी खबरों को बनाते हैं। मेरे कई मित्र जो खबरिया चैनल्स की दुनिया में हैं, वह कहते हैं कि अगर अखबार छपने बंद हो जाएं तो चैनल्स में खबरों का अकाल पड़ जाएगा। धीरे-धीरे खबरिया चैनल्स अपनी लोकप्रियता खोते जा रहे हैं। यह बात हकीकत है और इसे देर सवेर चैनल्स को स्वीकर करना ही पड़ेगा। indian govt constitution

टीआरपी को झूठी होड़ में चैनल्स अपने को खुद ही अव्वल नंबर बताने पर तुले हैं। जबकि खबरें और उनका स्तर उन्हें अव्वल नंबर बनाता है। जरा इस ओर ध्यान देना शुरू कर दीजिए और आमजन से जुड़ी खबरें दिखाने में कोताही बरतना छोड़िए। कुछ चैनल्स को इस बात की समझ आई है उन्होंने आम आदमी को खबरों से जोड़ने के कार्यक्रम भी शुरु किए हैं। इस तरह की सार्थक पहल को सभी चैनल्स में अपनाए जाने की जरुरत है। देखिए, फिर किस तरह लोकप्रियता के पायदान चढ़ते जाएंगे। जरा आम आदमी की अहमियत पहचानिए क्योंकि उसके लिए ही आपने खबरिया चैनल्स शुरू किया। indian govt constitution