हामिद अंसारी अंतिम दिन भी अपनी मुस्लिम मानसिकता से बाहर नही निकाल पाए .





हामिद अंसारी ने अपने आखरी भाषण में भी मुसलमानों तक सिमित मानसिकता को दर्शाते हुए कहा की किसी भी लोकतंत्र की पहचान उस देश में रह रहे अल्पसंख्यकों को मिली सुरक्षा से ही होती है.इस खबर को सभी अख़बारों और न्यूज़ चैनल सहित पोर्टल पर मुख्यता से प्रकाशित किया गया है इस खबर को नवभारत टाइम्स ने इस प्रकार से प्रकाशित इया है musalmano ke asuraksha ke mahaul

एक दिन पहले देश में अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिमों के लिए डर और असुरक्षा के माहौल की बात कहने के बाद उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने गुरुवार को संसद में सरकार को एक बार फिर इशारों में नसीहत दी। अपने कार्यकाल के आखिरी दिन अंसारी ने राज्यसभा में कहा कि किसी भी लोकतंत्र की पहचान उसमें अल्पसंख्यकों को मिली सुरक्षा से होती है। musalmano ke asuraksha ke mahaul



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नवभारत ने अपने इस लेख में लिखा है की “राष्ट्रपति अंसारी ने कहा, ‘मैंने 2012 में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के हवाले से कुछ कहा था। आज भी मैं उनके शब्दों को कोट कर रहा हूं। किसी लोकतंत्र की पहचान इससे होती है कि उसमें अल्पसंख्यकों की कितनी सुरक्षा मिली हुई है? लोकतंत्र में अगर विपक्षी समूहों को स्वतंत्र होकर और खुलकर सरकार की नीतियों की आचोलना करने की इजाजत न हो तो वह अत्याचार में बदल जाती है।musalmano ke asuraksha ke mahaul

इस बात इ अंदेश जताते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने औने संबोधन में आगाह कर दिया था फिर भी अंसारी जी नहीं समझ पाए और अपनी संकुच्त मानसिकता का परिचय छोड़ गए

नवभारत टाइम्स ने आगे लिखा है की “उपराष्ट्रपति के इस बयान पर उच्च सदन में खूब तालियां भी बजीं। अंसारी ने कहा, ‘साथ में अल्पसंख्यकों की जिम्मेदारी भी जरूरी है। उनके पास आलोचना का अधिकार है लेकिन उस अधिकार का मतलब यह नहीं है कि संसद को बाधित करें।’ उपराष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र की सफलता चर्चा में है न कि चर्चा को बाधित करने में।

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