संस्कृत से हुई है नमाज की उतपत्ति




संस्कृत काफी पुरानी भाषा है जो कई धर्मों में भी जाकर अपनी पहचान बना चुकी है। जिसे किसी एक धर्म से जोड़ा नहीं जा सकता। मुस्लिम धर्म का नवाज भी संस्कृत के नमस से निकली हुई है। संस्कृत शब्द आते ही ऐसा प्रतीत भले लगे कि यह कोई हिंदू से जुड़ा है लेकिन संस्कृत भाषा है जो धर्म को नहीं मानती यहां तक कि मुस्लिम में नवाज भी संस्कृत शब्द की ही उपज है। जिस इस्लाम में नवाज कुरान में है वह दरअसल संस्कृत धातु नमस् से बना है। जो बाद में नवाज हो गया। namaj ki utpatti sasnkirt se hui 

दत्त हो गया दाद और बन गया बगदाद।

नवाज का अर्थ होता है आदर और भक्ति में झुक जाना। जिसका पहला उपयोग ऋग्वेद में हुआ है जो नमस है। गीता के ग्यारहवें अध्याय में इस श्लोक को जानकर स्पष्ट हो जाएगा जिसमें नमो नमस्तेस्तु सहस्त्रकृत्वः पुनश्च भयोपि नमो नमस्ते। namaj ki utpatti sasnkirt se hui 

इससे साफ है कि यह पहले ऋग्वेद में आया और वही इस्लाम में चल रहा है। जो विभिन्न राष्ट्रों से होता हुआ मुसलमानों के दिलों में बस गया। दरअसल संस्कृत शब्द नमस् की यात्रा भारत से शुरू हुई जो ईरान पहुंची वहां प्राचीन फारसी अवेस्ता उसे नमाज पुकारने लगे औऱ आखिरकार यह तुर्की, आजरबैजान, तुर्केमानिस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान, इंडोनेशिया और मलेशिया के मुसलमानों के दिलों में समा गई। namaj ki utpatti sasnkirt se hui 

दरअसल भाषा की धर्म और जाति का मोहताज नहीं होती। मानव भले ही अपनी कॉपीराइट बना ले लेकिन भाषा उसे नहीं मानती और वह कुछ न कुछ देकर ही जाती है जिसे कॉपीराइट के दायरे में बांधा नहीं जा सकता। जो नमाज संस्कृत से निकला हो उससे उस भाषा की गहराई को समझा जा सकता है। namaj ki utpatti sasnkirt se hui 

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भाषा अपने आप में कितनी मजबूत और अद्भूत है इसको देखिए संस्कृत शब्द का भगः शब्द फारसी अवेस्ता में बग ह गया और दत्त हो गया दाद और बन गया बगदाद। भाषा में यही खूबी है कि जिस जगह बिचरती है उस स्थान का नामकरण कर देती है और अपनापन छोड़ जाती है। namaj ki utpatti sasnkirt se hui