राहुल गाँधी माँ की भी नहीं सुनता, अगर सुना होता तो गोवा और मणिपुर में कांग्रेस की सरकार होती।




राजनीति में समय का बहुत महत्व होता है। अगर समय पर कदम उठाए गए तो तय है कि आपकी जीत होगी। जिस प्रकार से कांग्रेस लगातार रसातल में जा रही है इससे कई तरह की बातें सामने आ रही हैं। साफ है कांग्रेस कमान पर भी सवाल उठ रहे हैं। जिस प्रकार से राहुल गांधी टिकट बंटवारे से लेकर नियुक्ति पर खास निर्देश जारी करते हैं उसके बाद भी कांग्रेस में कोई खास लोकप्रियता हासिल नहीं हुई। उनके निर्णय क्षमता पर तो सवाल उस समय उठ गए जब दो प्रदेशों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन निर्णय लेने की देरी की वजह से दोनों जगह भाजपा ने बाजी मार ली। rahul gandhi apni maa ki bhi sunta 

राहुल गांधी को यह बात समझनी होगी।

कांग्रेस पार्टी में कई तरह के गुट एक साथ चलते हैं। जब गोवा में सरकार बनानी थी तो कांग्रेस यह निर्णय करने में काफी देर कर दी की कमान किसके हाथ में होगा। राजनीतिक दल को समय का काफी ख्याल रखना पड़ता है। निश्चिततौर पर ऐसे में जब आप बड़ी पार्टी के रूप में उभरे हैं तो निर्णय लेने में देरी क्यों। इसके लिए तय है कि हाई कमान पर ऊंगली उठेगी ही। महासचिव अपनी रोटियां सेकती हैं और कई तरह की पेचिदिगियां कायम किए रहते हैं। rahul gandhi apni maa ki bhi sunta 

हाईकमान को इसपर लगाम भी लगाने की जरूरत है जिसकी कमी अभी कांग्रेस में देखी गई। राहुल गांधी अगर महासचिव को केवल ऑब्जर्वर के रूप में रखकर अपने निर्णय समय पर लेते तो मणिपुर और गोवा सरकार बन जाती। लेकिन गुटबंदी से अभी तक कांग्रेस इतनी ज्यादा उलझी है कि उसे कमान देने में भी निर्णय लेने में काफी समय लगा दिए जिससे दोनों जगह हाथ फिसल गए। rahul gandhi apni maa ki bhi sunta 

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गांधी अब भी भारतीय राजनीति मूल को समझ नहीं पाएं हैं जिससे ऐसे निर्णय में देरी होता है जिसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ता है। सोनिया गांधी जिस प्रकार से गर्त में जा रही कांग्रेस को संभाला अब उस ऊंचाई पर फिर से राहुल गांधी के वश की बात नजर नहीं आ रही है। समय सब कुछ सिखाता है अगर इससे सीख ले लिया जाए तो तय है कि आगे के लिए रास्ते आसान हो जाएंगें। राहुल गांधी को यह बात समझनी होगी। rahul gandhi apni maa ki bhi sunta