क्या आपको पता है कांवड़ यात्रा की शुरुवात कब और कैसे हुई ? जानिए




सावन महीना अति पावन महीना माना जाता है। इस महीने में भगवान् शिव जी की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। सावन के महीनो में ही देवघर स्थित बाबा धाम में लाखों की संख्या में श्रद्धालु बाबा का जलाभिषेक करने देवघर पहुंचते है। देवघर में जलाभिषेक के पश्चात श्रद्धालु बाबा बासुकीनाथ पहुंचते है जो बाबा के मंदिर के समीप ही स्थित है। मान्यता है की जो भक्त सावन के महीने में बाबा का जलाभिषेक करता है, उसकी समस्त प्रकार की मनोकामनाएं पूर्ण होती है। आइये जानते है कांवड़ यात्रा की शुरुआत कब और कैसे हुई है । sawan kanwad yatra history 

बाबाधाम, बैद्यनाथ धाम, देवघर, बैजनाथ धाम आदि नामों से विश्व-विख्यात प्रसिद्ध यह मंदिर झारखण्ड राज्य में स्थित है। बाबाधाम देश के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है जो द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक हैं। बाबा की महिमा और कथा का गुणगान समूचे देश में कही और सुनी जाती है। sawan kanwad yatra history 

कहा जाता है की लंकापति रावण ने भगवान् शिव जी को यहां लाया था, जबकि भगवान् विष्णु के हाथों इन्हें स्थापित किया गया था। धर्मं ग्रंथों के अनुसार रावण एक महान प्रतापी राजा था जो शिवभक्त भी था। एक बार रावण ने महादेव को प्रसन्न करने हेतु कठिन तपस्या की। sawan kanwad yatra history 

लंका धिपति नरेश रावण ने प्रसन्न करने हेतु कैलाश को भी अपने कंधे पर उठाकर तपस्या की। रावण की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ प्रकट होकर उन्होंने रावण से वरदान मांगने को कहा।

महादेव के इस वरदान से माता पार्वती भी नाराज थी  sawan kanwad yatra history

तत्पश्चात रावण ने भगवान् शिव जी से तीनों लोकों को जीतने के साथ-साथ अजर अमर होने का वर माँगा, भगवान् भोले ने रावण त्रिलोक विजयी होने का वर दे दिये, किन्तु भगवान् भोले ने रावण को अमरता का वरदान नहीं दिया। जिससे रावण क्रोधित हो गया तब भगवान शंकर बोले सृष्टि के बनाये नियमों को कभी बदला नही जा सकता है इसलिए यह सम्भव नही है।

कहते हैं क्रोधित रावण ने महादेव से कहा जब आप ऐसा नही कर सकते है तो मै अपना शीष अभी आपके चरणों में समर्पित कर देता हूँ। ऐसा कहकर रावण ने बारी बारी से अपने 9 शीस काटकर जब महादेव के चरणों में अर्पित कर दिया।

जब दसवां शीष रावण काटने लगा तो भोलेनाथ ने उसका हाथ पकड़ लिया। भगवान् भोले द्वारा रोके जाने पर रावण बोला आप मुझे क्यों रोक रहे है, मैं अब ब्रह्म तत्व में लीन होना चाहता हूँ।

तत्पश्चात भगवान् शिव जी बोले अमरता का वर छोड़ कोई और वर मांग लो तब बह्ग्वान रावण ने कहा तो अब आपको मेरे साथ लंका जाना पड़ेगा। भगवान् शिव जी बोले रावण में तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, अतः में इस शिव लिंग के रूप में लंका तुम्हारे साथ चलूंगा। sawan kanwad yatra history 

रावण पोखर के नाम से जाना जाता है  sawan kanwad yatra history

साथ ही उनहोंने रावण को सचेत करते हुए कहा यदि तुम रास्ते में कही भी मुझे रखोगे तो मैं उसी स्थान पर स्थापित हो जाऊंगा। वहां से लाख जतन के बाद भी तुम मुझे नही ले जा सकते हो। महादेव के इस वरदान से देवताओं में खलबली मच गई।

महादेव के इस वरदान से माता पार्वती भी नाराज थी। अतः विष्णु भगवान के निवेदन पर पार्वती मैया ने शिवलिंग उठाने से पहले उनसे आचमन करने का आग्रह किया। कहते हैं आचमन काल में ही देवराज इंद्र के आदेश से वरुणदेव रावण के उदर में प्रविष्ट हो गए।

जब रावण झारखण्ड के इस चिताभूमि क्षेत्र में आये जहां माता सती का हृदय गिरा था। वहां रावण को बहुत जोड़ से लघुशंका लगा। ये देवताओं की एक सोची समझी चाल थी। कहा जाता है जहां सती का हृदय गिरा था वही पर रावण को एक मानव दिखाई दिया। रावण ने उस आदमी से शिव लिंग को हाथ में रखने के लिए कहा। sawan kanwad yatra history 

उस ब्राह्मण वेश धारी मानव ने शीघ्र लघुसंका करके आने को कहा। साथ ही उसने ये भी कहा की यदि अधिक विलम्ब हुआ तो में इस शिव लिंग को जमीन पर रख दूंगा। वरुण के उदरस्थ होने के कारण रावण को लघुशंका में काफी समय लग गया। वहां आज भी वो पोखर स्थित है जो रावण पोखर के नाम से जाना जाता है। समय अधिक लगने के कारण उस व्यक्ति( भगवान् विष्णु ) ने शिव लिंग को उसी हृदया पीठ पर स्थापित कर वहां से अंतर्ध्यान हो गया। sawan kanwad yatra history 

सुल्तानगंज से देवघर की दुरी 105 किलोमीटर है sawan kanwad yatra history

बाद में जब रावण वहां आया तो वह बहुत क्रोधित हुआ। वहां आसपास में कही पानी का स्रोत नही था अतः अपने गदा के प्रहार से पहाड़ को तोड़ कर एक तालाब बना दिया जिसे आज शिव गंगा के नाम से जाना जाता है। बाबा के भक्त इस तालाब में स्नान ध्यान के पश्चात मन्दिर में पूजा पाठ आदि करते हैं।

ऐसे करें सावन शिवरात्रि में शिव जी की पूजा तो प्राप्त होगा इच्छित वर

रावण ने उस तालाब में स्नान ध्यान और आचमन आदि करने के पश्चात शिवलिंग को उठाने का बहुत प्रयत्नं किया लेकिन वो इसमें सफल नही हो सक़ा। अंत में गुस्सा कर उसने अपने अंगूठे से शिवलिंग को दवा दिया जिससे शिवलिंग और अंदर चला गया। जब रावण का क्रोध शांत हुआ तब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ।

तत्पश्चात रावण को भगवान विष्णु की माया समझ में आई। उसके बाद उसने तपोवन में जाकर तपस्या करके पुनः शिव को प्रसन्न किया और उनसे क्षमा मांगी। कहते है ओढऱदानी महादेव शंकर ने रावण से कहा तुम मुझे यहां लेकर आये हो इसलिए मैं तुम्हें यह वरदान देता हूँ जो भी यहां मेरा पूजा करेगा वो तुम्हारा नाम लेकर करेगा। जो ऐसा नही करेगा उसकी पूजा सफल नही मानी जायेगी।

बाबा की महिमा अपरम्पार है sawan kanwad yatra history

हिन्दू ग्रंथों के अनुसार बैजू नामक एक चरवाहा की कहानी भी आती है। जिनके पास अनेकों गायें था। जिनमें से एक गाय उस स्थान पर नित्य आया करती थी। ये गाय अपने दूध से भगवान् भोले का दूधाभिषेक करती थी।

एक दिन बैजू ने इस घटना को स्वंय देखा तब ये बात जाकर उन्होंने अन्य लोगों को भी बताई। कहा तो ये भी जाता है की भोलेनाथ ने उसे भी दर्शन देकर अपने नाम से जोड़ लिया। इसलिए इनका नाम बैजनाथ भी है। sawan kanwad yatra history 

एक कथा ऐसी भी आती है जिसके अनुसार देवताओं के वैद्य अश्वनी कुमार जब अस्वस्थ हुए तब इनके कृपा से ही ठीक हुए। इसलिए इनका एक नाम वैद्यनाथ भी पड़ा। वैद्यनाथ धाम में राम और लक्ष्मण ने सबसे पहले गंगा जल कांवड़ में भरकर विश्वामित्र के कहने पर भगवान् भोले को चढ़ाया था। वेसे तो भक्तों का आना यहां सालों भर लगा रहता है।

आज भी यहां के कंकड़ सुई की तरह पावन में चुभते हैं

खास करके सावन माह से लेकर कार्तिक माह तक यहां काँवरियों का तांता लगा रहता है इनके एक भक्त अजगेवी हुए, जिनका मन्दिर बिहार के सुल्तानगंज में उत्तरवाहिनी गंगा की मध्य धारा में स्थित है। यही से कांवड़िया कांवड़ में गंगा जल भरकर देवघर जाते हैं। सुल्तानगंज से देवघर की दुरी 105 किलोमीटर है।

कांवड़ियों के कई प्रकार होते है। एक होता है डाक बम इन्हें 24 घण्टे के भीतर सुल्तानगंज से बाबा मन्दिर पहुंचना होता है। दूसरा होता है खड़ा कांवड़िया अपने साथ एक और साथी को लेकर चलता है। जहां एक कांवड़िया थक जाता है वहां दुसरा कांवड़िया कांवड़ लेकर खड़ा रहता है। तीसरे प्रकार में सामान्य कांवड़िया होते हैं। ये छह या सात दिन में भी नाचते गाते बाबा के दरबार पहुंचते हैं। इनकी मस्ती देखने लायक होती है। हमेशा हर हर बम बम का नारा दिग्दिगन्त तक गुजायमान करते कांवड़िया लगातार चलते रहते हैं। sawan kanwad yatra history 

इन सबमें सबसे अधिक कठिन यात्रा दण्डी कांवड़ियों का होता है। ये लेटकर दंड प्रणाम देते हुए बाबा के दरवार तक पहुंचते हैं। इन्हें इस प्रक्रिया में महीनों लग जाता है तब जाकर इनकी यात्रा पूरी होती है। यात्रा के दौरान कांवड़ियों को कई नियमों का पालन करना होता है। इसमें पवित्रता का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। लघुसंका करने के बाद हाथ पैर को अच्छी तरह से धोने के बाद पवित्री लेकर ही कांवड़ उठाते हैं। शौच एवम भोजन के पश्चात स्नान आवश्यक होता है। अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें www.hindumythology.org

( हरि शंकर तिवारी )