23 मार्च शहीद दिवस पर विशेष




भगत सिंह का जन्म एक सिख परिवार में 28 सितम्बर 1907 को हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंहऔर माता का नाम विद्यावती कौर था।भदत सिंह बाल्य काल से ही अपने चाचा के पुस्तकालयसे क्रातिकारी किताबे पढते थे पर इसके समर्थक नहीं थे। लेकिन 13 अप्रैल 1919को अमृतसर में हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड की घटना सुनकर भगत सिंह ने अपने स्कूल से 12मील पैदल चलकर जालिया वाला बाग पहुँच गये। इस घटना से भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव पड़ा। लाहौर केनेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी में अपना योगदान देने के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की । shahid diwas special news

गोपाल अपनी साइकिल को लेकर ऐसे बैठगये shahid diwas special news

काकोरी काण्ड में राम प्रसाद विस्मिलसहित क्रान्तिकारियों को फाँसी एंव 16 अन्य को कारावासकी सजा से भगत सिंह काफी आहत हुए।1928 मेंसाइमन कमीशनके बहिष्कार के लिये भयानक प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों मे भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठी चार्ज भीकिया। इसी लाठी चार्ज से आहत होकर लाला लाजपत रायकी मृत्यु हो गयी। अब इनसे रहा न गया और एक गुप्त योजना केतहत इन्होंने पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट स्काट को मारने की योजना सोची। इस सोची गयी योजनानुसार भगत सिंह और राजगुरुलाहौर कोतवाली के सामने व्यस्तमुद्रा में टहलने लगे। उधर जय गोपाल अपनी साइकिल को लेकर ऐसे बैठगये जैसे कि वो ख़राब हो गयी हो। shahid diwas special news

गोपाल के इशारे पर दोनों सचेत हो गये। उधर चन्द्र शेखर आजादपास के डी०ए०वी० स्कूल की चहारदीवारी के पास छिपकर घटना कोअंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे। 17 दिसंबर 1928 को करीब सवा चार बजे, ए० एस० पी० सॉण्डर्स के आते हीराजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सर में मारी जिसके तुरन्त बाद वह होश खो बैठे। इसकेबाद भगत सिंह ने 3-4 गोली दाग कर उसके मरने का पूरा इन्तज़ाम कर दिया। ये दोनोंजैसे ही भाग रहे थे कि एक सिपाही चनन सिंह ने इनका पीछा करना शुरू कर दिया।चन्द्रशेखर आज़ाद ने उसे सावधान किया – “आगे बढ़े तो गोली मार दूँगा।” नहीं मानने पर आजादने उसे गोली मार दी। इस तरह इन लोगों ने लाला लाजपत राय कीमौत का बदला अंग्रैजों से ले लिया। shahid diwas special news




लालू यादव निर्दोष है उन्हें जेल से रिहा कराके रहूँगा : शत्रुधन सिन्हा

भगतसिंह यद्यपि रक्तपात के पक्षधर नहीं थे परन्तु वे वामपंथी (कम्युनिष्ठ ) विचारधारा पर चलते थे,तथा काल मार्क्स केसिद्धान्तों से पूरी तरहप्रभावित थे। यही नहीं, वेसंमाजवादके पक्के पोषक भी थे। इसी कारणसे उन्हें पूँजीपतियों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं आती थी। उससमय चूँकि अँग्रेज ही सर्वेसर्वा थे तथा बहुत कम भारतीय उद्योगपति उन्नति कर पायेथे, अतःअँग्रेजों के मजदूरों के प्रति अत्याचार से उनका विरोध स्वाभाविक था। मजदूर विरोधीऐसी नीतियों को ब्रिटिश संसद में पारित न होने देना उनके दल का निर्णय था। सभीचाहते थे कि अँग्रेजों को पता चलना चाहिये कि हिन्दुस्तानी अब जाग चुके हैं औरउनके हृदय में ऐसी नीतियों के प्रति आक्रोश है। ऐसा करने के लिये ही उन्होंनेदि्ललीकी केन्द्रीय एसेम्बली में बमफेंकने की योजना बनायी और 8 अप्रैल 1929 को क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंहने वर्तमान नई दिल्ली स्थित ब्रिटीश भारतकी तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बलीके सभागारसंसद भवनमें अंग्रेज़ सरकार को जगाने केलिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भीदी। उस समय वे दोनों खाकी कमीज़ तथा निकरपहने हुए थे। बम फटने के बाद उन्होंने”इंकलाब-जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद!” का नारालगाया और अपने साथ लाये हुएपर्चे हवा में उछाल दिये। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गयी और दोनों को ग़िरफ़्तारकर लिया गया। shahid diwas special news

26 अगस्त, 1930 को अदालत ने भगत सिंह को भारतीयदंड संहिता की धारा 129, 302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 और 6एफ तथा आईपीसी की धारा 120 के अंतर्गत अपराधी सिद्ध किया। 7अक्तूबर, 1930 को अदालत के द्वारा 68 पृष्ठों का निर्णय दिया, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फांसी कीसजा सुनाई गई। फांसी की सजा सुनाए जाने के साथ ही लाहौर में धारा 144 लगा दी गई। इसके बाद भगत सिंहकी फांसी की माफी के लिए प्रिवी परिषद में अपील दायर की गई परन्तु यह अपील 10जनवरी, 1931 को रद्द कर दी गई। इसके बादतत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष पं. मदन मोहन मालवीय ने वायसराय के सामने सजा माफी केलिए 14 फरवरी, 1931 को अपील दायर की कि वह अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए मानवताके आधार पर फांसी की सजा माफ कर दें। भगत सिंह की फांसी की सज़ा माफ़ करवाने हेतुमहात्मा गांधी ने 17 फरवरी 1931 को वायसराय से बात की फिर 18 फरवरी, 1931 को आम जनता की ओर से भी वायसरायके सामने विभिन्न तर्को के साथ सजा माफी के लिए अपील दायर की। यह सब कुछ भगत सिंहकी इच्छा के खिलाफ हो रहा था क्योंकि भगत सिंह नहीं चाहते थे कि उनकी सजा माफ कीजाए। shahid diwas special news

23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दोसाथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई। फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन कीजीवनी पढ़ रहे थे और जब उनसे उनकी आखरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने कहा कि वह लेनिनकी जीवनी पढ़ रहे थे और उन्हें वह पूरी करने का समय दिया जाए।कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दीकि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- “ठहरिये! पहले एकक्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।” फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल करबोले – “ठीक है अब चलो।” shahid diwas special news

फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे –

मेरा रँग दे बसन्ती चोलामेरा रँग दे;
मेरा रँगदे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला।।

फाँसी के बाद कहीं कोई जनआक्रोश न भड़क जाये इसके डर सेअंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुरकी ओर ले गये जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनकोजलाया जाने लगा। गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आये। इससे डरकर अंग्रेजोंने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों कोसतलुज नदीमें फेंका और भाग गये। जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंनेइनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया। और भगत सिंहहमेशा के लिये अमर हो गये। आज भी भारत और पाकिस्तान की जनता भगत सिंह को आज़ादी के दीवाने के रूप मेंदेखती है जिसने अपनी जवानी सहित सारी जिन्दगी देश के लिये समर्पित कर दी। ऐसे वीरसपुत के मेरा आज शत-शत नमन। shahid diwas special news

(लाल बिहारी लाल)

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