कितना याद करते हैं आप राजेंद्र बाबू को ?

आज ३ दिसम्बर को डॉ. राजेंद्र प्रसाद जयंती हैं। डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद (3 दिसम्बर, 1884 – 28 फरवरी, 1963) भारत के पहले राष्ट्रपति थे। वह बेहद विद्वान एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से थे।  you recall Rajendra Babu

जिन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में प्रमुख भूमिका निभाई। उन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में भी अपना योगदान दिया था जिसकी परिणति २६ जनवरी १९५० को भारत के एक गणतंत्र के रूप में हुई थी।

राष्ट्रपति होने के अलावा वह स्वतंत्र भारत में केन्द्रीय मन्त्री के रूप में भी कुछ समय के लिए कार्यरत थे। पूरे देश में बेहद लोकप्रिय होने के कारण उन्हें राजेन्द्र बाबू या देशरत्न कहकर भी पुकारा जाता था।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वज वैसे तो कुआँगाँव, अमोढ़ा (उत्तर प्रदेश) के निवासी थे। यह एक कायस्थ परिवार था। लेकिन कुछ कायस्थ परिवार इस स्थान को छोड़ कर बलिया जा बसे थे। कुछ परिवारों को बलिया भी रास नहीं आया तो वे वहाँ से बिहार के जिला सारन के एक गाँव जीरादेई में जा कर बस गए। इन परिवारों में कुछ शिक्षित लोग भी थे।

इन्हीं परिवारों में राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वजों का भी परिवार था। जीरादेई के पास ही एक छोटी सी रियासत थी – हथुआ। चूँकि राजेन्द्र बाबू के दादा पढ़े-लिखे थे, अतः उन्हें हथुआ रियासत की दीवानी मिल गई।

पच्चीस-तीस सालों तक वे उस रियासत के दीवान रहे थे। उन्होंने स्वयं भी कुछ जमीन खरीद ली थी। राजेन्द्र बाबू के पिता महादेव सहाय इस जमींदारी की देखभाल किया करते थे। राजेन्द्र बाबू के चाचा जगदेव सहाय भी घर पर ही रहकर जमींदारी का ही काम देखते थे। अपने पाँच भाई-बहनों में वे सबसे छोटे थे इसलिए पूरे परिवार में सबके लाडले थे।

राजेन्द्र बाबू के पिता महादेव सहाय संस्कृत और फारसी के ज्ञाता थे एवं उनकी माता कमलेश्वरी देवी एक धर्मपरायण महिला थीं।[3] पाँच वर्ष की उम्र में ही राजेन्द्र बाबू ने एक मौलवी साहब से फारसी में शिक्षा शुरू की।

उसके बाद वे अपनी प्राथमिक शिक्षा के लिए छपरा के जिला स्कूल गए। राजेंद्र बाबू का विवाह उस समय की परिपाटी के अनुसार बालक अवस्था में ही, लगभग १३ वर्ष की उम्र में, राजवंशी देवी से हो गया।

विवाह के बाद भी उन्होंने पटना की टी० के० घोष अकादमी से अपनी पढाई जारी रखी। उनका वैवाहिक जीवन बहुत सुखी रहा और उससे उनके शिक्षा अथवा अन्य कार्यों में कोई रुकावट नहीं पड़ी।

सन १९६२ में अवकाश प्राप्त करने पर राष्ट्र ने उन्हें “भारत रत्‍न” की सर्वश्रेष्ठ उपाधि से सम्मानित किया। यह उस पुत्र के लिये कृतज्ञता का प्रतीक था जिसने अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर आधी शताब्दी तक अपनी मातृभूमि की सेवा की थी।

अपने जीवन के आख़िरी महीने बिताने के लिये उन्होंने पटना के निकट सदाकत आश्रम चुना। यहाँ पर २८ फ़रवरी १९६३ में उनके जीवन की कहानी समाप्त हुई। यह कहानी थी श्रेष्ठ भारतीय मूल्यों और परम्परा की चट्टान सदृश्य आदर्शों की। हमको इन पर गर्व है और ये सदा राष्ट्र को प्रेरणा देते रहेंगे।  you recall Rajendra Babu,  you recall Rajendra Babu,  you recall Rajendra Babu