नवउदारवाद और मजदूरों पर दबाव

1 मई यानी मजदूर दिवस। 365 दिन में एक दिन मजदूरों के लिए। अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस जो मई दिवस के नाम से जाना जाता है। इसकी शुरुआत 1886 में शिकागो में उस समय हुई थी, जब मजदूर मांग कर रहे थे कि काम की अवधि आठ घंटे हो और सप्ताह में एक दिन की छुट्टी हो। इसी समय कुछ हिंसक घटनाएं भी हुई थी। labour day

जिसमें मजदूर और पुलिस अधिकारियों की मौत हुई थी। 1889 में पेरिस में अंतरराष्ट्रीय महासभा की द्वितीय बैठक में जब फ्रेंच क्रांति को याद करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया कि इसको अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाए, उसी वक्त से दुनिया के अस्सी देशों में मई दिवस को राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया जाने लगा।

आज मजदूरों के बूते ही उद्योग धंधे चलते हैं। जिन पर ही होता है हमारा कम ध्यान। जिनकी दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। आज देश में जिनकी संख्या 45 करोड़ से ज्यादा है। और इनमें 94 फीसदी असंगठित मजदूर हैं। जो बुनियादी जरुरतों से काफी दूर हैं। इन्हें काम के घंटों से नहीं है परहेज। लेकिन इन्हें वेतन भी सही नहीं मिलते। labour day

ये मजदूर काम की बेहतर स्थितियों स्वास्थ्य के लिए ईएसआई कार्ड, भविष्य निधि जैसी बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं। इन्हें वंचित रखा गया है। कामगार और मजदूरों की सबसे बड़ी दिक्कत है उनके द्वारा किए गए काम के घंटे और उसके एवज में दिए जा रहे पैसे। कई कंपनियों में 12-12 घंटे के दो शिफ्ट पर काम होते हैं। ऐसी कंपनियों में 24 घंटे तक भी काम करवाया जाता है। जिसकी कीमत कामगार को चुकानी पड़ती है।

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यह दुर्घटना के शिकार हो रहे हैं। और उसके बाद कंपनी उन्हें किसी तरह से अपनी कंपनी से अलग कर देते हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने सप्ताह में 48 घंटे काम करने के नियम बनाया था, जिसे भारत ने भी स्वीकार किए हुए हैं। यह नियम 1919 में पास हुए थे। 1929 की आर्थिक मंदी में काम के घंटों को 40 घंटे किया गया। जिसपर मतभेद भी है। labour day

भारत में भी कई मजदूर संगठन इसे नहीं मानता। एटक का कहना है कि आज नया दौर है नव उदारवाद है। श्रमिक पर अलग से फोर्स है। इनके लिए बजट प्रावधान हो। सीधे तौर पर अर्थव्यवस्था से श्रमिक को जोड़ा जाए। एक समान काम एक समान वेतन लागू हो। आज जितना काम लिया जाता है उसके एक चौथाई वेतन दिया जाता है। labour day

आज श्रमिकों को पीएफ, इएसआई जैसी सुविधाएं जुटाई जानी चाहिए। आज श्रम को तब्दील कर बाजारवादी नहीं बनाया जाना चाहिए। श्रम कानून में ऐसे बदलाव हों, जिनसे मजदूरों के हकों की रक्षा हो सकें, उन्हें कार्यस्थल पर सभी मूलभूत सुविधाएं मिलें, मजदूर यूनियन बनें और अतिरिक्त काम का अतिरिक्त पैसा मिले पर दिक्कत यह है कि मालिक अपने हिसाब से श्रम कानूनों में बदलाव चाहते हैं। labour day

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वो सारे नियम अपनी सुविधा के हिसाब से बनवाना चाहते हैं, जिसमें मजदूरों को उनका हक कम-से-कम मिले। आज सभी अपने अपने हिसाब से श्रमिक कानून की बदलाव चाहते हैं सरकार भी, मालिक भी और मजदूर भी। भारत जैसे विकासशील देश में यूरोप के नियम नहीं चलते हैं। अब जबकि देश में बेरोजगारी की तादाद लगातार बढ़ रही है ऐसे में घंटे को कम कर सरकार भी रोजगार और बढ़ाने के निर्देश जारी कर सकती है। labour day

हालांकि, इस उदारीकरण के दौर में कंपनियों की अपनी मनमानी जगजाहिर है। पहले मजदूरों की बात होती थी तो कंपनियों की मजदूरों की बात होती थी आज एक वर्ग और है जहां मजदूर की तादाद काफी अधिक है। लेकिन संगठन नहीं है। भारत में 1923 से इसे राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया जाता है। वर्तमान में समाजवाद की आवाज कम ही सुनाई देती है। ऐसे हालात में मई दिवस की हालत क्या होगी, यह सवाल प्रासंगिक हो गया है।

ऐतिहासिक दृष्टि से ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ के नारे को देखें तो उस वक्त भी दुनिया के लोग दो खेमों में बंटे हुए थे। अमीर और गरीब देशों के बीच फर्क था। सारे देशों में कुशल और अकुशल श्रमिक एक साथ ट्रेड यूनियन में भागीदार नहीं थे। आज मजदूरों की दुर्दशा के लिए ठेकेदारी व्यवस्था भी काफी हद तक जिम्मेवार है। labour day

सरकार अगर चाहे तो इस पर नियंत्रण कर सकती है पर वह तो खुद ही बढ़ावा दे रही है। सरकार अपना अधिकांश काम अनुबंध पर दे रही है। ठेकेदारी प्रथा को रोकने के लिए पहल सरकार को करनी चाहिए। labour day

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आज होता यह है कि एक आदमी को ठेका मिलता है वह दूसरे को देता और काम वहां तीसरा करता है। लंबी चेन है। इसे नया नाम भी दिया गया है पेटी कांट्रेक्टर। इससे श्रमिकों को काफी नुकसान होता है। उन्हें अपनी मूल मजदूरी भी नहीं मिलती है। labour day

जहां तक महिलाओं की बात है तो ठेकेदारी व्यवस्था में सबसे ज्यादा महिलाएं ही पिसती जा रही हैं। ठेकेदारी व्यवस्था में महिलाएं ज्यादा प्रताड़ित हैं। आज जो हक दिया गया है उसमें आज 6 फीसदी महिलाएं भी कवर नहीं हो रही है। आज भी देश में सार्वजनिक सेक्टर में तो महिलाओं को उनका हक और सुविधाएं मिल जा रही है। लेकिन हमारे यहां असंगठित क्षेत्र ज्यादा है जहां महिलाएं ज्यादा संख्या में काम कर रही हैं। labour day

मातृत्व श्रम कानून में परिवर्तन चाहते हैं। एटक ठेकेदारी प्रथा के खिलाफ हैं। जहां स्थायी काम है वहां स्थायी मजदूर ही रखे जाने चाहिए। जहां काम अस्थायी है वहां अस्थायी मजदूर रखो, लेकिन उन्हें वेतन स्थायी मजदूर वाला ही मिलना चाहिए। ठेकेदारी में अस्थायी मजदूरों से काम तो पूरा लिया जाता है, लेकिन उन्हें वेतन बहुत कम मिलता, अन्य सुविधाएं तो बहुत दूर की बात है।

आज भी इन सारे व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है। ठेकेदारी व्यवस्था में शोषण ज्यादा होता है। बहरहाल आज मजदूरों को नव उदारवाद में अलग से भार पड़ा है। लेकिन उनकी सुविधाएं नहीं बढ़ी है आज जरुरत है श्रम कानून के बदलाव की। आज श्रमिकों को बाजारवादी नहीं बनाए जाने की आवश्यकता है। labour day

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