बीजों पर किसानों का ही है मौलिक अधिकार

-़़डॉ.राजाराम त्रिपाठी

भारत में कृषि सिर्फ पेशा नहीं बल्कि यह जीवन और स्वाभिमान से जुड़ा कर्म है. तमाम आर्थिक परेशानियों और आपदाओं के बावजूद भारतीय किसान कृषि कर्म को लगातार करते रहे हैं, भले ही उन्हें इन परेशानियों की वजह से अपनी जीवन की इहलीला भी समाप्त करनी क्यों ना पड़े. भारत में एग्रीकल्चर को ‘कल्चर’ के रूप में स्वीकारा गया है. 
जैसे गांव-घर में रस्म-रिवाज और प्रथाओं का प्रचलन है, वैसी प्रथाओं का प्रचलन भारतीय कृषि को लेकर भी है. देश के बहुत से राज्यों में एक पर्व मनाया जाता है, जिसे ‘वनगड़ी’ कहते हैं. दरअसल, जब धान की रोपाई होती है, तो पहली रोपनी के दिन किसान अपने पास-पड़ोस और रिश्तेदारों को प्रीतिभोज देते हैं और हर्षोल्लास मनाते हैं – इसी पर्व को ‘वनगड़ी’ कहते हैं. इसी तरह कृषि में प्रयुक्त होने वाले बीज, खाद, उपकरण की अदला-बदली और साझापन किसानों की संस्कृति है. ऐसी स्थिति में कोई किसान अगर बीज किसी साथी किसान के साथ साझा करता है तो न केवल यह भारतीय कानून के मुताबिक वैध बल्कि सांस्कृतिक तौर पर भी प्रथा के अनुकूल है. 
दरअसल, ताजा मामला गुजरात का है. गुजरात में बहुराष्ट्रीय कम्पनी पेप्सिको इंडिया होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड ने एक खास किस्म का आलू उगाने वाले किसानों पर कॉपीराइट उल्लंघन का आरोप लगाते हुए अहमदाबाद कोर्ट में एक करोड़ रूपये की क्षतिपूर्ति का मुकदमा दर्जा कराया है. पेप्सिको ने आरोप लगाया गया है कि इन किसानों ने कम्पनी की इजाजत के बगैर खास किस्म के आलू (एफसी-5 या फिर एफएल2027) उगाए हैं और साथ ही उनकी बिक्री की है, जो कि प्लांट वैराइटी प्रोटेक्शन (पीवीपी) राइट्स का उल्लंघन है. कम्पनी ने पादप किस्म एवं किसान अधिकार संरक्षण (पीपीवी एंड एफआर) कानून 2001 के तहत किसानों के खिलाफ यह मामला दर्ज कराया है. पेप्सिको ने कहा है कि इस प्रजाति का आलू उगाने का अधिकार सिर्फ पेप्सिको के पास है. उल्लेखनीय है इस खास किस्म के आलू से लेज ब्रांड का चिप्स बनाया जाता है. बहुराष्ट्रीय कम्पनी पेप्सिको का दावा है कि साल 2016 में ही उसे ’भारत में इस आलू के उत्पादन का खास अधिकार’ मिला हुआ है. 
गुजरात के आलू किसानों और पेप्सिको इंडिया होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड (पीआईएच) के बीच चल रही कानूनी लड़ाई में अखिल भारतीय किसान महासंघ (आइफा) के बैनर तले देश भर के किसान संगठन लामबंध हो रहे हैं. किसान संगठनों ने किसी भी किस्म की फसल के बीजों पर किसानों का मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए सरकारी हस्तक्षेप की मांग की है. किसानों का समर्थन करने के लिए किसान संगठन, शोधकर्ता, वैज्ञानिक और बीज उत्पादकों ने एक स्वर में आवाज उठाया है तथा किसानों के खिलाफ अदालती मामलों को बिना शर्त वापस लेने की मांग की है. अखिल भारतीय किसान महासंघ इस मामले को लेकर केंद्र सरकार से एक पृथक बिल लाने की मांग करेगी. केंद्र में अगली सरकार के गठन के बाद महासंघ से जुड़े किसान संगठनों के प्रतिनिधि केंद्रीय कृषि मंत्री से मिल कर बीज पर किसानों के मौलिक अधिकारों से संबंधित एक विशेष विधेयक लाने की मांग करेगी. आइफा का कहना है कि चाहे कोई फसल हो, सरकार देश के किसी भी हिस्से में बीजों पर किसानों को स्पष्ट अधिकार प्रदान करे. वर्तमान आंदोलन का उद्देश्य बीजों पर किसानों का अधिकार स्थापित करना है. यह आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक कि बीजों पर किसानों के अधिकार को लेकर स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं हो जाता. बीजों पर किसानों का सर्वोच्च अधिकार होना चाहिए, फिर चाहे फसल कोई भी हो तथा किसी भी व्यक्ति, स्थानीय या विदेशी संगठन, कंपनी, वैज्ञानिकों या सरकार को किसी भी अधिकार का दावा करने का अधिकार न हो. 
किसानों का तर्क है कि पीवीपी एंड एफआर अधिनियम, 2001 की धारा 39 के अनुसार देश में किसानों को किसी भी संरक्षित किस्म के बीज को बोने के अलावा उसे अपने कृषि उपज को बचाने, उपयोग करने, पुनः बोने, आदान-प्रदान करने, साझा करने या बेचने की अनुमति है. वह केवल इन बीजों की ब्रांडिंग कर बेच नहीं सकता. इसे इस तरह समझा जा सकता है कि अगर किसी किसान ने बीच खरीदा, उसने बोया, फिर फसल से बीज बचाया और इसे एक्‍सचेंज किया तो यह उसका मौलिक अधिकार माना जाता है. सेक्‍शन 39(1) (iv)  के तहत अगर कोई किसी खास किस्‍म को रजिस्‍टर करा भी लेता है तो इस देश के किसान उस खास किस्‍म के बीज को भी बेच सकता हैं, बशर्ते वो इन बीज की पैकेजिंग या लेबलिंग कर न बेचे. 
पेप्सिको द्वारा किसानों पर दायर मुकदमे पर कई गम्भीर सवाल भी उठे हैं. पहला, किसी भी पेटेंट कराये हुए बीज की खेती कानूनी तौर पर अपराध नहीं है, अगर किसान बीज का संरक्षण कर अगली बार उसे बोता है या साथी किसानों से बीज की अदला-बदली या साझा करता है तो ये किसानों का मौलिक अधिकार है. जबकि कम्पनी ने तथ्य रखा है कि आलू की किस्म एफसी 5 पंजाब के किसानों को खेती करने के लिए दी गई थी और उनसे करार था कि ये किसान कम्पनी को ही इस बीज से उत्पादित आलू बेचेंगे. जबकि वास्तविकता यह है कि कम्पनी ने किसानों को यह नहीं बताया कि पंजाब के अलावा देश के किन हिस्सों में किसानों द्वारा इस प्रजाति के आलू को खुद ही बोया जाता है. दूसरा मुद्दा है एफसी 5 के पेटेंट होने से पहले भी देश में इसे बोया जाता रहा है, जो कि सुलभता से उपलब्ध था और इसपर अब पेप्सिको अपना एकाधिकार बताती है. दरअसल, यह पेप्सिको की खोज है ही नहीं, बल्कि इसने इसका केवल पेटेंट कराया है. कंपनी ने कोर्ट को आलू की किस्म एफ 5 को नई बताकर भ्रमित करने का प्रयास किया है. जबकि ये किस्म पहले से ही भारतीय किसानों द्वारा बोया जाता रहा है. पेप्सिको जैसी कम्पनी ने अपने व्यापारिक फायदे के लिए किसानों द्वारा लंबे समय से बोई जाने वाली किस्म को पेटेंट करवाया है फिर किसानों पर अनुचित दवाब बनाया जा रहा है जो किसानों के मौलिक अधिकारों का हनन है. ध्यान देने वाली है कि किसानों के खेतों से आलू के किस्म का नमूना कंपनी ने धोखे से हासिल किया है. 
इस पूरे प्रकरण को इस तरह भी समझा जा सकता है कि भारत में नीम का पेड़ लगभग घर-घर है और किसान असंगठित तौर पर निबोली का व्यापार करते हैं. अगर कोई कंपनी भी इस व्यापार में आती है और आगे चल कर वह यदि निबोली का पेटेंट करा ले तो क्या देश भर के उन सभी किसानों के नीम के पेड़ या उन पेड़ों से उत्पादित निबोली संबंधित कंपनी की मल्कियत हो जाएगी? नहीं, ठीक इसी तरह का मामला पेप्सिको के साथ हुआ है. अब समय आ गया है कि कृषि क्षेत्र में किसानों के अधिकारों से खेलने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कुचक्र का दमन किया जाए और इसके लिए एक पृथक कानून सरकार अविलंब बनाये ताकि किसानों के मौलिक अधिकारों की रक्षा हो सके. 
कृषि क्षेत्र पर गहराता संकट केवल भारत के लिए नहीं बल्कि इसकी चपेट में दुनिया के विकासशील देश है और विकसित देश विकासशील देशों के किसानों के अधिकारों को अपने हित में खत्म करने पर तुले हुए हैं. इन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र की आमसभा ने एक घोषणापत्र स्वीकृत किया था जो किसानों के अधिकारों और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले अन्य लोगों से संबंधित था. इस घोषणापत्र में उन किसानों के मानवाधिकारों को मान्यता दी गई थी जिनकी “बीज संप्रभुता” खतरे में है. इसके पक्ष में 121 और विरोध में 8 मत पड़े थे, जबकि 52 देशों ने इसमें हिस्सा ही नहीं लिया था. अधिकांश विकासशील और गरीब देशों ने पक्ष में मतदान किया जबकि अधिकांश विकसित देश मतदान में शामिल नहीं हुए. अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, हंगरी, इजराइल और स्वीडन ने घोषणापत्र के विरोध में मतदान किया था. आदर्श स्थिति में तो इस घोषणापत्र के बाद तमाम देशों में किसानों के हितों की रक्षा के लिए युद्धस्तर पर प्रयास होने चाहिए थे लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा है.
इस साल फरवरी में टिमोथी वाइज की किताब “ईटिंग टूमॉरो : एग्री बिजनेज, फैमिली फार्मर्स एंड द बैटल फॉर द फ्यूचर ऑफ फूड” जारी हुई थी. वाइज ने इसमें स्पष्ट तौर पर लिखा है कि सरकारें संगठित कृषि का उपाय सुझा रही हैं, जिसकी तकनीक और बीज पर कॉरपोरेट का नियंत्रण होगा. इसे कृषि संकट के उपाय के तौर पर पेश कर किसानों को भ्रमित किया जा रहा है. इससे किसानों के अधिकारों का क्षरण होगा. उल्लेखनीय है कि बहुराष्ट्रीय कंपनिया किसानों के बौद्धिक सम्पदा अधिकार को हड़पना चाहती है. सरकार को इन मुद्दों पर तुरंत किसान न्यायिक प्राधिकरण बनाने की जरूरत है, ताकि किसानों को त्वरित न्याय मिल सके.

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