छोटे रोजगारों के लिए है माइक्रोफाइनेंस

माइक्रोफाइनेंस के अंतर्गत बैंक कम पूंजी से अपना रोजगार शुरू करनेवालों को छोटी-छोटी रकम बतौर ऋण देती हैं। इस तरह के ऋण में ज्यादा कागजी कार्रवाई नही की जाती। बैंकों ने छोटे-छोटे रोजगारों के लिए पूंजी मुहैया कराने के लिए कमर कस ली है। रिक्सावाले से लेकर पानवाले तक को आर्थिक मदद देने की इस कवायद के लिए बैंक अपनी छोटी पूंजी ब्याज पर देकर इस क्षेत्र में अपने विस्तार को योजनाएं बना रहे हैं। न केवल सरकारी और निजी बल्कि विदेशी बैंक भी माइक्रो ऋण कारोबार बढ़ा रहे हैं। पंजाब नेशनल बैंक, आईसीआईसीआई, एचएसबीसी और रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड ने तो इसके लिए अपनी योजनाओं कार्य भी कर रहे हैं।

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आईसीआईसीआई बैंक ने अपने माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो को दोगुना कर 2,600 करोड़ रुपए कर दिया है| आईसीआईसीआई बैंक तो शीर्ष 30 सूक्ष्म वित्त संस्थानों के साथ उनकी परियोजनाओं को वित्तीय मदद देने के लिए काम कर रहा है। विदेशी रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड ने अपने लघु वित्त पोर्टफोलियों को 300 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 450 करोड़ रुपए करने का फैसला किया है। ब्रिटेन का यह बैंक फिलहाल देशभर में 30 लघु वित्त संस्थानों को सीधे वित्तीय मदद दे रहा है। इसके अलावा 41 लघु वित्त इकाइयों से करार दिया है। इसके तहत उन्हें प्रशासनिक योग्यता और मजबूत कारोबारी मॉडल बनाने के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

वहीं एचएसबीसी बैंक ने देशभर में 21 माइक्रोफाइनेंस संस्थानों के साथ करार किया है। तो आखिर क्या है माइक्रोफाइनेंस। माइक्रोफाइनेंस के अंतर्गत बैंक कम पूंजी से अपना रोजगार शुरू करनेवालों को छोटी-छोटी रकम बतौर ऋण देती हैं। इस तरह के ऋण में ज्यादा कागजी कार्रवाई नही की जाती। रिक्शावाले, सब्जीवाले, छोटे दुकानदार आदि को यह लोन दिया जाता है और किश्तों में उनसे रकम वापस ली जाती है। ये किश्ते दैनिक या मासिक हो सकती हैं। अधिकतर मामलों में बैंक एनजीओ के माध्यम से ऐसी योजनाएं चलाते हैं। माइक्रोफाइनेंस के तहत कर्ज की गारंटी के रूप में जैसे कि जेवर, जमीन आदि रेहन के रूप में नहीं रखतीं।

इसमें कर्ज के लिए जरूरी है कि कर्ज लेने वालों का एक समूह बने। जिस समय विश्व में बड़े-बड़े वित्तीय संस्थान लड़खड़ाते दिखाई पड़ रहे थे, उसी समय बहुत छोटे कर्ज देने का कारोबार तेजी से बढ़ रहा था। छोटे कर्ज एक हजार रुपए के हो सकते हैं, पांच हजार के हो सकते हैं।इनकी कर्ज वापसी साप्ताहिक या मासिक सुविधानुसार हो सकती है। पिछले कुछ सालों से बहुत छोटे कर्ज का कारोबार यानी माइक्रोफाइनेंस कारोबार करीब चालीस फीसदी सालाना की रफ्तार से बढ़ रहा है। दरअसल इसका कारण है कि माइक्रोफाइनेंस का उद्देश्य समाज के अति गरीब को ऊपर लाना है। इसके लिए माइक्रोफाइनेंस लोगों का समूह बनवाता है और फिर उन्हें कर्ज देता है।

पेशे के जानकार लोग कर्ज लेने वालों को पेशेगत प्रशिक्षण देकर उन्हें काम करने और कमाने के लिए तैयार करते हैं। उनके काम की लगातार समीक्षा की जाती है और किसी भी तरह की समस्या आने पर उनका निदान किया जाता है। इस तरह के साधनहीनों का काम करने का मौका दिया जाता है। जहां तक माइक्रोफाइनेंस की भागीदारी की बात है तो 2001 में जहां माइक्रोफाइनेंस की भागीदारी एक प्रतिशत हुआ करती थी, वहीं 2005 में यह छह फीसदी तक हो गई और 2010 में यह 15 फीसदी तक है। जिसमें 2018 में और बढ़ोत्तरी हुई है। क्षेत्र में करीब पांच करोड़ पचास लाख कर्ज लेने वाले हैं, पर डिफाल्टर न के बराबर हैं।

रेहड़ी चलाने से लेकर चाय की छोटी दुकान चलाने के लिए कर्ज लेने वालों पर मुख्यधारा के वित्तीय क्षेत्र की नजर हाल तक नहीं थी। पर बांग्लादेश में इसकी सफलता ने दुनिया की नजरों को इस ओर घुमा दिया। तमाम संकटों का सामना करने वाले वे बैंक ज्यादा सक्षम साबित हुए, जिन्होंने माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र को बड़ी रकम दी है। दरअसल, बहुत छोटे कर्ज देने वाले डिफाल्ट इसलिए नहीं करते क्योंकि उनका अस्तित्व इस पर निर्भर है। वे बताते हैं कि बहुत गरीबी में रहने वालों का कर्ज व्यवहार खास तरह का होता है। हो सकता है कि एक दिन उनके पास खाने के लिए कुछ ना हो, तो वह पड़ोसी से कर्ज में दस रुपए मांग सकते हैं। कुछ दिनों बाद वही स्थिति पड़ोसी की हो सकती है तो वह दस रुपए वापस करने के साथ साथ दस रुपए और उधार दे सकता है। इस तरह से काम चल जाता है।

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इस कारोबार में दो मॉडल हैं-एक है माइक्रोफाइनेंस संस्थाएं और दूसरा स्वयं सहायता समूह। माइक्रोफाइनेंस संस्थाएं तमाम तरह के स्त्रोतों से पैसा जुटाती हैं। बैंकों से भी लाती हैं और आगे कम आय वर्ग वाले लोगों को देती हैं। कर्ज आम तौर पर समूह को दिया जाता है। समूह आगे अपने सदस्यों को देता है। स्वयं सहायता समूह भी बैंकों से, माइक्रोफाइनेंस संस्थानों से पैसा लाता है। इसके अलावा स्वयं सहायता समूह की अपनी बचत भी होती है, जो आगे कर्ज देने के काम आती है। बैंकों की रुचि इस धंधे में खासी बढ़ गई है। डिफाल्ट रेट कम होने के अलावा इस धंधे में अपार संभावनाएं हैं। गरीबों की तादाद अमीरों से बहुत ज्यदा है। जिस देश में 80 करोड़ की आबाजी बीस रुपए प्रतिदिन पर बसर कर रही हो, यहां निश्चिय ही छोटे कर्ज लेने वालों की संख्या बड़ी ही होगी।

माइक्रोफाइनेंस में जहां तक ब्याज की बात है तो इसमें बीस से चौबीस फीसदी तक होती है, जहां क्रेडिट कार्ड से लिया गया पैसा एक अवधि के बाद तीस से पैंतीस फीसदी सालाना लगता है। वहीं माइक्रोफाइनेंस में सौ रुपए में दो रुपए ही ब्याज लगता है। ब्याज दर के हिसाब से अन्य देशों के मुकाबले यह दर कम है। इस मॉडल को नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चरल एंड रूरल डेवलपमेंट यानी नाबार्ड की मदद मिलती है। गैर सरकारी संगठनों, सरकारों और बैंक का एक गठजोड़ भी छोटे कर्ज मुहैया कराता है। इनके अलावा स्वतंत्र और विशेषज्ञ माइक्रोफाइनेंस संस्थाएं भी सीधे कर्ज मुहैया करती हैं। मुख्यधारा की जिन वित्तीय संस्थों से गरीबों को कर्ज नहीं मिलता, उन्हें कर्ज देकर माइक्रोफाइनेंस संस्थाएं वित्तीय समावेश के एजेंडे को आगे बढ़ाने का दावा करती हैं।

आखिर क्यों सफल है माइक्रोफाइनेंस। दरअसल जहां कानूनी तकनीकी जमानतें फेल हो जाती हैं, वहां पर सामाजिक दबाव काम आता है। चूंकि माइक्रोफाइनेंस में कर्ज समूह को दिए जाते हैं, समूह के जरिए आगे सदस्यों को दिए जाते हैं, इसलिए जिम्मेदारी समूह की होती है। समूह को गच्चा देने का सामाजिक साहत आम तौर पर कर्ज लेने वाला नहीं करता। कर्ज लेने वाला परंपरागत बैंकिंग के कोर्ट कचहरी से भले ही न डरे, पर उस समाज से डरता है जिसके बीच वह रहता है। इसलिए बैंकों को माइक्रोफाइनेंस कारोबार से सीखना चाहिए कि हर क्लाइंट से एक सा व्यवहार नहीं किया जाता है। दूसरी बात यह है कि वित्तीय जरूरतें हर इलाके की अलग हैं, इसलिए वहां के लिए तरीके भी वहीं के हिसाब से निकलेंगे। यहां पर बैंकों को नीचे से चीजों को समझना होगा और उन्हें ऊपर लाना
होगा।

तीसरी बात यह है कि अब गरीब और अशिक्षित आदमी भी वित्तीय मसलों को खूब समझता है। तभी तो कभी दक्षिण भारत में सफल माइक्रोफाइनेंस अब उत्तर भारत के राज्यों में
बेहतर नतीजे दे रहे हैं। खासकर बिहार में भी बढ़िया काम हो रहा है। बिहार के पश्चिम चंपारण जिला जो पहले स्वयं सहायता समूह में सबसे नीचे हुआ करता था, अब राज्य में अग्रणी हो गया। बिहार में 2007 में 73,339 स्वयं सहायता समूह थे तो 2009 में ही यह आंकड़ा 93,410 हो गया यानी करीब उन्नीस फीसदी की बढ़ोत्तरी। जिसमें 2018 आते आते 10 फीसदी की और बढ़ोत्तरी दर्ज हुई है। वहीं छत्तीसगढ़ में यह बढ़ोत्तरी 46 फीसदी तक रही। हालांकि उत्तर प्रदेश में 19 फीसदी और उत्तराखंड में स्वयं सहायता समूहों में करीब 15 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है।

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