106 साल की हुई पहली फीचर फिल्म -“राजा हरिश्चंद्र”

आज का दिन सिनेमा के लिए गौरव का दिन है। आज भारतीय सिनेमा ने अपने 106 वर्ष पूरे किए। आज से ठीक 106 वर्ष पूर्व 3 मई 1913 को भारत की पहली मूक फीचर फिल्म राजा हरिश्चंद्र बंबई, आज की मुंबई के कोरोनेशन सिनेमेटोग्राफ में प्रदर्शित की गई थी। इसके निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखक थे दादा साहेब फाल्के। तब से अब तक कई मुकाम को पार कर चुका है हमारा सिनेमा। आज 106 साल में हमारा सिनेमा काफी कुछ खुल भी गया। first feature film

अब यह हमारा सिनेमा आजकल बॉलीवुड कहा जाता है। राजा हरिश्चंद्र से जो सफर 106 साल पहले शुरू हुआ था, वह दबंग, डर्टी पिक्चर, बाहुबली तक पहुंच आया है। जो सफर मूक फिल्मों से शुरू हुआ था, वह बेहद बोलती फिल्मों तक आ पहुंचा है। दादा साहेब फाल्के ने भस्मासुर मोहिनी, लंका दहन, कालिया मर्दन, श्री कृष्ण जन्म जैसी 125 से भी अधिक फिल्में छोटी-बड़ी बनाई। राजा हरिश्चंद्र का महत्व सिर्फ भारत की पहली फिल्म के रूप में ही नहीं, स्वदेशी आंदोलन की एक पहचान के रूप में भी है। first feature film

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1918 में एस एन पाटणकर ने राम वनवास के कथानक पर चार फिल्मों की श्रृंखला बनाकर एक नई शुरुआत की। इस दौर में अधिकांश फिल्में धार्मिक ऐतिहासिक कथानकों पर ही बनीं। ये फिल्मकारों का दोहरा हित साध रही थीं। एक ओर उन्हें गुलामी के दौर से गुजरती जनता को अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ने की रचनात्मक संतुष्टि मिलती, दूसरी ओर फिल्म को मिल रही सफलता उन्हें व्यापारिक लाभ भी देती। first feature film

1920 में वत्सला हरण के लिए पहली बार पोस्टर निकाले गए। हिंदी फिल्मों में पहली बार सर्वप्रथम संगीत देने वाले संगीतकार द्वारका दास संपथ थे, जिन्होंने हारमोनियम और तबलावादकों के साथ हिंदी फिल्मों में पार्श्व संगीत की शुरुआत की।

1923 में भक्त विदुर बनी जिसमें भक्त विदुर में महात्मा गांधी की झलक देखकर ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था। नए दशक में आजादी के आंदोलन के साथ सिनेमा के विषय भी बदलते गए और सावकारी पाश जैसी महत्वपूर्ण फिल्म सामने आई, जिसमें भारतीय सिनेमा की पीड़ा को पूरी संवेदना के साथ उठाया गया था। 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा बनकर तैयार हुई। इस फिल्म को बनाने में चालीस हजार रुपए लगाए गए।

इस फिल्म को देखने के लिए लोग उमड़ पड़े थे। आज दुख इस बात को लेकर है कि आलम आरा का एक भी प्रति भारत में उपलब्ध नहीं है। यह फिल्म मूल रूप से पारसी थिएटर शैली में प्रदर्शित नाटक का फिल्माकंन भर थी।1932 में पहली सामाजिक प्रेम कहानी मोहब्बत के आंसू के सात हिंदी सिनेमा ने कुंदन लाल सहगल जैसी निधि पाई। उसी समय प्रेमचंद का आगमन फिल्मों में हुआ और उनकी कहानी पर मिल मजदूर बनी। इसी समय बॉम्बे टाकीज में अछूत कन्या से अशोक कुमार और देविका रानी ने दस्तक दी। first feature film

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उस समय फिल्मकारों की कोशिश यह होती थी की सिनेमा समाज में कुछ ना कुछ संदेश जरूर दें। 1934 में हंटरवाली के रूप में नाडिया का उदय हुआ जिन्होंने मनोरंजन का एक नया स्वाद दर्शकों को दिया। 1935 में आर सी बोराल ने अपनी फिल्म धूप छांव में पार्श्व गायन का सफल प्रयोग किया। यही से कलाकार की गाने की प्रतिबद्धता कम हो गई। यानी अब कलाकारों को खुद गाने की जरूरत नहीं रह गई। कहा जाता है कि हिंदी सिनेमा के तीस का दशक ईरानी का था। ईरानी ने 1937 में किसान कन्या के साथ सिनेमा के काले सफेद परदे को रंगीन बनाने की शुरुआत कर दी।

ईरानी ने ही भारतीय फिल्म उद्योग को प्रयोग करने की हिम्मत दी उन्होंने तकनीक ही नहीं, विषय के स्तर पर भी विविधता दी। वहीं चालीस के दशक में महबूब की रोटी, विमल राय की हमराही, ख्वाजा अहमद अब्बास की धरती के लाल, शांताराम की डॉ कोटनिश की अमर कहानी जैसी फिल्में भी आई। पांचवां दशक फिल्मों के युगांतकारी माना जाता है। इस समय गुरुदत्त, विमलराय, ख्वाजा अहम अब्बास जैसे लोगों की फिल्में इस दशक को अभिभूत कर गई। इस समय कई ऐसे फिल्में बनी जो यादगार है। जिसमें दो बीघा जमीन, देवदास, बूट पॉलिश, श्री 420, आवारा, दो आंखें बारह हाथ, मदर इंडिया, सुजाता, झनक झनक पायल बाजे।

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खास बात यह है कि 1952 में मुंबई में पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह आयोजित किया गया। इसी समय आवारा के बाद राजकपूर अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल गई। फिल्म की बात हो सत्यजीत रे की नहीं ऐसा हो नहीं सकता। सत्यजीत रे पाथेर पंचाली बनाया। सत्यजीत रे ने कम खर्च में संवेदनशील फिल्म बनाने का एक नया व्याकरण सिनेमा को दिया जिसे पूरे विश्व ने सराहा। भारत में पहली टेक्नीकलर फिल्म सोहराब मोदी की फिल्म झांसी की रानी है। साठ का दशक में काफी मनोरंजक फिल्में बनी। इसी वक्त मुगले आजम बनाई गई।

गंगा जमुना, साहब, बीवी और गुलाम, बंदिनी, तीसरी कसम, गाइड, मुझे जीने दो, आशीर्वाद और उपकार इस दशक की बेहतरीन फिल्में हैं। वहीं सत्तर का दशक में एक बेहतरीन फिल्में जो लोगों के दिलों के बेहद करीब है वह फिल्म बनी जी हां शोले। इसी दशक में जंजीर भी अमिताभ बच्चन को स्टार बना दिया। आठवें दशक में कला फिल्में और व्यावसायिक फिल्मों में भी बंटवारा हो गया कहे तो अतिशक्योक्ति नहीं होगी। इसी समय सारांश, सदमा, मासूम और अर्थ जैसी कुछेक फिल्में बॉलीवुड को आज भी गौरवांवित करता है। first feature film

नब्बे का दशक युवाओं का दौर है जिसमें आज के स्टार सभी भी अपने जलवे विखेर रहे हैं। इसी वक्त आमिर खान, शाहरुख खान, सलमान खान और गोविंदा ने पदार्पण किया। रोमांश और प्यार को नए ढंग से पेश किया जाने लगा। जो आजतक सिलसिला चल रहा है। भारतीय सिनेमा ने इसके बाद नए दौर में है जहां रोज कुछ प्रयोग हो रहे हैं। फटाफट सिनेमा बन जाता है और बिजनेस के रूप में 100 करोड़ का क्लब में भी शामिल हो जाता है। आज जिस प्रकार से तेजी से समाज बदल रहा है उस सभी को दर्शाने में फिल्म पीछे नहीं है। बहरहाल सिनेमा के 106 साल पूरे होने पर हमारे पास इतराने के लिए काफी कुछ है जिस पर हम गर्व कर सकते हैं।

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