“वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे” पर विशेष

प्रेस की आजादी और हम

जन संचार का सबसे सशक्त माध्यम बन चुके प्रेस की शुरुआत 131 ईस्वी पूर्व रोम में हुई थी और पहला समाचार-पत्र “ऐक्टा दिउर्ना” (दिन की घटनाएं) था. जबकि पेपर छापने की मशीन का आविश्कार 15वीं शताब्दी में हुआ था. हालांकि भारत में इसकी शुरुआत 1780 में जेम्स हिकी ने हिक्की गजट या बंगाल गजट से किया था. तब से अब तक हजारों समाचार पत्र निकले और बंद हुए लेकिन इन सब के बीच एक खास बात जो उस वक्त भी व्यवहारिक थी और आज भी व्यवहारिक है वो है “प्रेस की आजादी”. world press freedom day

दुनिया में प्रत्रकारिता की स्वतंत्रता बरकरार रहे, निष्पक्ष और निर्बाध रूप से लोगों तक सूचनाएं पहुंचती रहे इसके लिए पूरी दुनिया में प्रतिवर्ष 3 मई यानि कि आज के दिन“विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस” मनाया जाता है लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रत्रकारिता का वास्तविक स्वरूप जिंदा है? क्या पत्रकारिता राजनेताओं, बिजनेसमैन और सामंतवादी प्रथा के नियंत्रण से मुक्त है? क्या मौजूदा समय में निर्भीक पत्रकारिता मुमकिन है?

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धूमिल हो रहा पत्रकारिता का स्वरूप

जब हम इन सवालों के जबाव को वर्तमान परिदृष्य में ढ़ूंढने की कोशिश करते हैं तो पत्रकारिता का शुद्ध रूप कहीं खोया-खोया सा दिखाई देता है. पूंजीवाद की इस दौड़ में पत्रकारिता का निर्मल स्वरूप कुछ धूमिल सा हो गया हैं. world press freedom day

क्योंकि मौजूदा दौर में मीडिया संस्थानों पर राजनेताओं और बाहुबलियों का प्रभुत्व बढता जा रहा है जिसका असर यह हो रहा है कि जनता तक जो सूचनाएं पहुंचनी चाहिए वह या तो दबा दी जाती हैं या फिर उनका इस्तेमाल अपने हित को देखकर किया जाता है. जरूरत के हिसाब से सूचनाओं के स्वरूप में बदलाव कर उसे जनता के सामने परोसने का काम किया जा रहा है.

इतना ही नही पत्रकारों पर हमले आम बात हो गई है. इस मामले में दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका में भी निर्भीक पत्रकारिता का स्वरूप बहुत अच्छा नही है.‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2019’ की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका प्रेस की आजादी के मामले में 180 देशों की सूची में 48वें स्थान पर बना हुआ है. वहीं इंडिया का प्रेस की स्वंतत्रता के मामले में इस लिस्ट में 140वां स्थान हैं. world press freedom day

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खास बात यह है कि ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2019’ की इस रिपोर्ट में भारत को 2 पायदान का नुकसान उठाना पड़ा है. इसका मतलब यह है कि 2018 में जारी इसी रिपोर्ट में भारत 138वें स्थान पर रहा था. पत्रकारों और पत्रकारिता के हितों की सुरक्षा के मामले में भारत अपने पड़ोसी देश श्रीलंका और म्यांमार से भी बुरी स्थिति में है. इस मामले में जहां म्यांमार भारत से दो पायदान ऊपर 138वें स्थान पर है तो वहीं श्रीलंका भारत से 14 पायदान ऊपर 126वें स्थान पर है.

पत्रकारों की हितों की रक्षा के मामले में यूरोपीय देश नार्वे सबसे सुरक्षित देश माना जाता है. नार्वे ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2019’ में प्रथम रैंक पर कायम है. उसके बाद क्रमश: फिनलैण्ड और स्वीडन का स्थान आता हैं. ऐसे में सवाल यह उठता है कि 21वीं सदी में सबसे तेजी से विकास के पथ पर अग्रसर भारत में पत्रकारिता का ऐसा स्वरूप क्यों है?

खतरे में पत्रकार

इसके पीछे खास वजह यह है कि राजनीतिक या विभिन्न कारणों से पत्रकारों के प्रति दुश्मनी की भावना बढ़ी है. इन्ही कारणों से भारत में बीते साल 2018 में कम से कम 6 पत्रकारों की हत्या कर दी गई. एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय पत्रकार कई खतरों का सामना करते हैं, खासतौर पर,  ग्रामीण इलाकों में गैर अंग्रेजी भाषी मीडिया के लिए काम करने वाले पत्रकारों को इन खतरों का सामना करना पड़ता है. पत्रकारों की निर्भीक लेखनी पर रोक लगाने की कोशिशें करने के कई मामले सामने आये हैं.

इसका बुरा प्रभाव यह हो रहा है कि जनमानस तक जिस तरह की सूचनाओं को पहुंचना चाहिए वह नही हो पा रहा है. इसके अलावा सबसे खास बात यह भी है कि मौजूदा दौर में मीडिया संस्थान किसी खास विचारधारा से प्रभावित होकर चलाए जा रहे हैं जिससे इसका स्वरूप भेदभावपूर्ण हो गया है. world press freedom day

जिसका असर यह हो रहा है कि जनता सच से भमित हो रही है. उसके लिए गलत और सही में फर्क कर पाना मुश्किल हो गया है. ऐसे में पक्षपात रहित सूचनाएं और समाचार मिल सकेंगे इसकी गुंजाइश कम ही रह गई हैं. world press freedom day 

-कुलदीप सिंह

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