राष्ट्रवाद और राजनीति

केन्द्र की सत्ता में मोदी सरकार के कार्यकाल के 5 वर्ष पूरे हो रहे हैं अपने इस कार्यकाल के दौरान सरकार ने देश में विकास की नई इबारत लिखी. इसी के तहत देश की अर्थव्यस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए सरकार ने कई कड़े फैसले भी लिए. नोटबंदी और जीएसटी को इसके उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है. सिर्फ इतना ही नहीं इस दौरान सरकार ने विदेश नीति पर काफी ज्यादा जोर दिया जिससे वैश्विक स्तर पर न सिर्फ भारत की छवि में सकारात्मक बदलाव देखने भी मिला बल्कि वैश्विक पटल पर भारत का दबदबा भी देखने को मिला.  

आज की ताज़ा ख़बर

इसके साथ ही सरकार ने रक्षा के क्षेत्र और सीमाओं की सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया और चीन के साथ हुआ डोकलाम विवाद इसी का नतीजा था. जब चीन की तमाम धमकियों के बावजूद दोनों देशों की सेनाएं 72 से भी अधिक दिनों तक एक-दूसरे के सामने खड़ी रही. हालांकि इन सब के बीच एक शब्द सबसे अधिक चर्चा में रहा वह “राष्ट्रवाद” शब्द रहा था. पिछले 5 वर्षों के दौरान राष्ट्रवाद का नारा सबसे ज्यादा प्रसिद्ध रहा और इसी को लेकर राजनीति भी खूब हो रही है.

लेकिन भाजपा के शाशनकाल के दौरान ही राष्ट्रवाद आखिर क्यों सबसे ज्यादा उभर कर सामने आया? इस सवाल का जवाब भाजपा की विचारधारा से ही परिलक्षित होता है, क्योंकि भाजपा शुरू से ही प्रखर राष्ट्रवाद की नीति को फालो करती है. मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारे लगाए जाने की घटना सामने आई. जिस पर काफी राजनीति हुई. इसके बाद देश में दो बड़ी आतंकी घटनाएं भी हुई थी जिसमें उरी के दौरान हमारे 21 जवान शहीद हुए थे.

जिसके बाद भारतीय सेना ने पीओके में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया था. इसके अलावा इस साल 26 फरवरी को कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हमला किया गया था जिसमें 40 से भी अधिक जवान शहीद हो गए थे. जवानों के इस बलिदान का बदला लेने के लिए सरकार ने इस बार पीओके में जैश ए मोहम्मद के ठिकानों पर एयर स्ट्राइक किया था.

कंप्यूटर की तरह तेज बनाये अपना दिमाग

इन सभी घटनाओं के दौरान विपक्षी पार्टियों ने सरकार से सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगा जिस पर जमकर राजनीति हो रही है और चुनावी साल होने की वजह सरकार भी राष्ट्रवाद के मुद्दे को भुनाने की कोशिश कर रही है यही वजह है कि मोदी सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रवाद को केन्द्र में रखकर अपने चुनावी कार्यक्रम को आगे बढ़ा रही है. तो वहीं मुख्य निपक्षी पार्टी कांग्रेस ने अपने चुनावी दृष्टिपत्र में कश्मीर से “अफस्पा” हटाकर सेना की शक्तियां सीमित करने जैसे वादों को शामिल किया है जिससे राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रविरोधी विचारधारा के मुद्दे को बल मिला है.

इसी वजह से राष्ट्रवाद पर राजनीति गरमा गई है. भाजपा इसी के आधार पर कांग्रेस, सपा, बसपा सहित तमाम विपक्षी पार्टियों को देश विरोधी एजेंडे को चलाने वाली पार्टियां करार दे रही है. जबकि विपक्ष भी यह कह रही हैं कि राष्ट्रवाद किसी की बपौती नहीं है. लेकिन राष्ट्रवाद पर जारी राजनीति के बीच विपक्ष देश को यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि केन्द्र की सत्ता में बैठी मोदी सरकार मुस्लिम विरोधी है और धर्म के नाम पर देश को बांटने की कोशिश कर रही है.

पाश्चात्य संस्कृति से पुरानी और बड़ी है भारतीय संस्कृति

विपक्ष की इस तरह की धार्मिक उन्माद फैलाने वाली राजनीति को मात देने के लिए भाजपा ने भी प्रखर राष्ट्रवाद की भावना को लेकर आगे बढ़ रही है. राजनीतिक दलों की धार्मिक उन्माद फैलाने वाली इस राजनीति के कारण समाज के दो धाराओं में बंटने का खतरा मंडरा रहा है.

इसको लेकर साल 2016 में इंटेलिजेंस ब्यूरो ने एक रिपोर्ट जारी करते हुए कहाथा कि राजनीतिक दलों की उन्माद फैलाने वाले भाषणों की वजह से देश में कट्टरपंथी विजारधारा तेजी से फैल रही है. हालांकि मौजूदा हालात में राष्ट्रवाद की नाव के सहारे ही राजनीतिक पार्टियां चुनावी वैतरणी को पार करने की कोशिश कर रही है. बहरहाल राष्ट्रवाद की राजनीति किसके लिए कितना फायदा और किसको कितना नुकसान होता है यह तो 23 मई के बाद पता चल जाएगा.

कुलदीप सिंह   

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *