लौह पुरुष का पुनर्जन्म V/S आयरन लेडी की मौत

 

देश के लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल की 143वीं जयंती पर प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने देश के आयरन मैन सरदार बल्लभ भाई पटेल की दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति स्टेच्यू ऑफ़ यूनिटी का लोकार्पण कर इसे देश को समर्पित किया. इसकी ऊंचाई 182 मीटर है. यह मूर्ति चीन की स्प्रिंगफील्ड बुद्धा से करीब 29 मीटर ऊंची है. न्यूयार्क की स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी से यह दोगुनी ऊँची है.

यह विशाल मूर्ति मात्र 33 माह के रिकार्ड समय में बन कर तैयार हुई है. इसके निर्माण में 3000 करोड़ की लागत आई है. वैसे तो स्टेच्यू ऑफ़ यूनिटी को बनाने की घोषणा पीएम नरेन्द्र मोदी ने 2010 में उस वक़्त किया था जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे लेकिन इसको लेकर कार्य 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद ही शुरु हो सका. 2014 में मोदी सरकार ने मूर्ति के निर्माण का कार्य का ठेका एल एंड टी कंपनी को दिया लेकिन इसका वास्तविक कार्य 2015 मे शुरु हुआ.

लौह पुरुष सरदार पटेल की जयंती के दिन ही देश की आयरन लेडी इंदिरा गांधी की पुण्य तिथि भी 31 अक्टूबर को मनाई जाती है. लेकिन इस बार जहां पटेल की 143वीं जयंती पर दुनिया ने लौह पुरुष का पुनर्जन्म देखा तो वहीं आयरन लेडी इंदिरा गांधी को दुनिया ने एक बार फिर से मरते हुए देखा.

जानकारों की माने तो कल तक गांधी परिवार के कारण सिर्फ पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के योगदान को ही देश के सामने रखा जाता था और देश के लिए अपना जीवन आहूत करने वाले दूसरे महापुरुषों को इतिहास की किताबों तक सीमित कर दिया गया था. मोदी सरकार ने उन्हें एक बार फिर से दुनिया के पटल पर जीवंत बनाने का कम किया है.

जानिए क्यों सरदार थे भारत के बिस्मार्क

इस बार जहां भारत के बिस्मार्क के नाम से प्रसिद्ध सरदार पटेल की 143वीं जयंती पर स्टेच्यू ऑफ़ यूनिटी का लोकार्पण होने से सारी दुनिया सिर्फ और सिर्फ सरदार की बाते कर रही थी तो दूसरी तरफ 31 अक्टूबर को ही देश की आयरन लेडी इंदिरा गांधी की 34वीं पुण्यतिथि पर सिर्फ कांग्रेस पार्टी ने उन्हें याद किया. आयरन मैन के सामने आयरन लेडी की प्रसिद्धि दब कर रह गई. मीडिया के किसी कोने में उनको लेकर छोटे-छोटे आर्टिकल छपे जबकि सरदार पटेल का दुनिया ने पुनर्जन्म देखा.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि दोनों नेताओं ने अपने-अपने समय में जनहित से जुड़े कठोर निर्णय लिए थे. जो कि आसान काम नहीं थे, इन्ही फैसलों ने उन्हें आयरन मैन और आयरन लेडी का खिताब दिया. आईये जानते हैं कि वो कौन सी वजहें है जिनके कारण इन्हें यह खिताब मिला. शुरुआत करते हैं देश के पहले उपप्रधानमंत्री और पहले गृहमंत्री रहे सरदार बल्लभ भाई पटेल से. एक किसान परिवार में जन्मे सरदार बल्लभ भाई पटेल ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद 562 रियासतों में बंटे देश का एकीकरण किया.

पटेल में गजब की प्रशासनिक क्षमता थी जिसके कायल खुद महात्मा गांधी भी थे उन्होंने उनको लेकर एक बार कहा था कि अगर सरदार पटेल नहीं होते तो 562 रियासतों का एकीकरण नामुमकिन था. पटेल ने नेहरू को चीन, पाकिस्तान की चालों को लेकर भी सावधान किया था लेकिन नेहरू ने उनकी नहीं सुनी. अगर नेहरू ने उनकी बातों को सुना होता तो वर्तमान की समस्याएं नहीं होती.

पूरी दुनिया थी दूरदर्शिता की कायल

भारत के बिस्मार्क के नाम से प्रसिद्ध सरदार पटेल की प्रशासनिक कुशलता की पूरी दुनिया कायल थी. इसको लेकर लन्दन टाइम्स ने लिखा था कि सरदार पटेल के सामने बिस्मार्क की उपलब्धियां कुछ भी नहीं हैं. जिस कुशलता से उन्होंने बिना किसी रक्तपात के 562 रियासतों को देश में मिलाया था यह आसान नहीं था. यह भारत की रक्तहीन क्रान्ति थी. पूरा विश्व उनकी दूरदर्शिता और योग्यता से अभीभूत था. पटेल, नेहरु द्वारा कश्मीर को अंतर्राष्ट्रीय समस्या बताये जाने के फैसले से नाराज थे वो यह मानते थे कि नेहरू को कश्मीर को संयुक्तराष्ट्र संघ में नहीं ले जाना चाहिए था. सरदार पटेल की बातों को दरकिनार करने का खामियाजा भारत ने 1962 भारत-चीन युद्ध में भुगता था.

त्वरित निर्णय लेने में माहिर

जबकि दूसरी तरफ इंदिरा गांधी ने अपने पिता जवाहर लाल नेहरु के निधन के बाद सक्रिय राजनीति में अपना कदम रखा. उन्होंने पहली बार पहली बार प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल में सूचना और प्रसारण मंत्री का पद संभाला था. शास्त्री के निधन पर वह देश की तीसरी प्रधानमंत्री चुनी गईं. इंदिरा को देश की आयरन लेडी कहे जाने के पीछे कई वजहे है जिसने उन्हें यह ख़िताब दिया. इंदिरा गाँधी के द्वारा लिए गये फैसले न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिहाज से बेहद अहम रहे.

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा के शाशनकाल में ही पहली बार भारत ने 18 मई 1974 को राजस्थान के पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण किया. इंदिरा के इस निर्णय ने सारी दुनिया को चकित कर दिया था. विश्व के देशों को यह भी नहीं समझ आ रहा था कि वो क्या करें. उस दौरान अमेरिका वियतनाम युद्ध में लगा था लेकिन इस परीक्षण के बाद उसने तिलमिलाहट में भारत पर कई प्रतिबन्ध भी लगाये. जिसे इंदिरा ने एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया. उनके ही शाशनकाल में ही पहली बार भारत ने स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा के रूप में अंतरिक्ष में अपना कदम रखा.

पंजाब से उग्रवाद को किया ख़त्म

इसके अलावा उन्होंने पंजाब से उग्रवाद को उखाड़ फेंकने के लिए यह जानते हुए भी स्वर्ण मंदिर में सेना भेजने जैसा साहसिक कदम उठाया कि इससे सिखों की धार्मिक भावनाओं को आहत होने का खतरा है. इंदिरा ने ही 1971 के जंग में पूर्वी पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान से अलग कर दिया. जिसके बाद बांग्लादेश का जन्म हुआ. इसको लेकर जब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में उनकी आलोचना हुई तो उन्होंने अपने बचाव में कहा था कि जब जर्मनी में हिटलर सरेआम यहूदियों की ह्त्या कर रहा था तो क्या पश्चिमी देश चुप बैठे थे.

देश पर थोपा आपातकाल

इसके आलावा भारतीय गणतंत्र की स्थापना के बाद जब इंदिरा गांधी को लगने लगा कि देश की जनता अब उनके विरोध में उतर चुकी है तो उन्होंने जनता के विरोध को दबाने के लिए देश में आपातकाल लागू कर दिया. रातों-रात हजारों नेताओं को जेल में ठूंस दिया गया. यह फैसला लेना इतना आसान नहीं था लेकिन फिर इंदिरा गांधी ने लिया. यही वजह थी कि उन्हें आयरन लेडी ऑफ़ इंडिया के नाम से जाना जाता है.

इंदिरा और सरदार पटेल का देश के लिए योगदान अमिट है लेकिन सरदार को तत्कालीन सरकारों ने इतिहास में दफन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यही वजह है कि इतने सालों के बाद तक उनकी जगह नेहरू के किस्से सुनाये जाते रहे. जबकि भारत को एकसूत्र मे पिरोने का कार्य 600 ईसा पूर्व में कौटिल्य की मदद से चन्द्रगुप्त ने किया था. और 20वीं सदी में लौह पुरुष सरदार बल्लभभाई पटेल ने किया. उनके बारे में कहा जाता है कि उनमें चाणक्य की कूटनीति और शिवाजी का शौर्य और दूरदृष्टि थी. बहरहाल मोदी सरकार ने उन्हें दुनिया के सामने स्टेच्यू ऑफ़ यूनिटी के रूप में लाकर एक बार फिर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया है.

-कुलदीप सिंह