मोदी को रोक पाएगा तीसरा मोर्चा !

लोकसभा चुनाव समाप्त होने की कगार पर है। नतीजे 23 मई को आने वाले हैं। लेकिन राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव बाद में परिदृश्य के मद्देनजर पहले से ही तैयारियां शुरू कर दी हैं। विपक्षियों का मानना है कि व्यापक तौर पर यह उम्मीद की जा रही है कि किसी भी पार्टी या किसी भी गठबंधन को निर्णायक जनादेश मिलने की संभावना नहीं है।

हार से नहीं बच सकती दीदी- अमित शाह

हालांकि भाजपा के सबसे बड़े दल के रूप में उभरने को लेकर किसी को कोई संदेह नहीं हैं। संदेह इस बात को लेकर भी ज्यादा नहीं है कि कांग्रेस की सीटें इस बार पिछले चुनाव के मुकाबले बढ़ेंगी लेकिन वह अकेले दम पर सरकार नहीं बना पाएंगीं।

एनडीए गठबंधन के बहुमत के जादुई आंकड़े 272 से दूर रहने की स्थिति में उसे सत्ता में पहुंचने से रोकने के लिए कांग्रेस और गैर एनडीए दलों ने तमाम तरह की योजनाओं पर काम करना शुरू कर दिया है। हालांकि ये तैयारियां उसी सूरत में काम आएंगी, जब चुनाव के बाद एनडीए बहुमत के आंकड़े से काफी दूर रह जाता है और नए सहयोगी दल उसके साथ जुडने से इनकार करते हैं।

इस बीच तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने तीसरे मोर्चे के लिए कवायद शुरु कर दिया है. इस कड़ी में उन्होंने सबसे पहले केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद विजयन ने इसे काफी अहम बैठक बताया था।

चंद्रशेखर राव ने इसके बाद डीएमके के नेता स्टालिन से मुलाकात की और कोशिश की कि वे तीसरे मोर्चे को आगे बढ़ाएं जिसमें कांग्रेस को बाहर से समर्थन को कहा जाए। हालांकि स्टालिन तीसरे मोर्चे को तैयार दिखे लेकिन कांग्रेस को बाहर रखकर नहीं। वहीं इस बीच आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू का भी बयान आया कि राहुल गांधी देश को अच्छी तरह समझते हैं।

लेकिन तीसरे मोर्चे की दिक्कत यह है कि उत्तर प्रदेश से कोई संदेश नहीं आ रहा है। मायावती और अखिलेश बैठक में नहीं आ रहे हैं। ऐसा माना जा रहा है कि नवीन पटनायक और केसीआर एनडीए को समर्थन कर देगें। ममता बनर्जी यूनाइटेड भारत की रैली की थी लेकिन यह ज्यादा सफल होता नहीं दिख रहा है। शरद पवार भी अभी दम साधे हैं।

कंप्यूटर की तरह तेज बनाये अपना दिमाग

दरअसल चुनाव के अंतिम दौर में पहुंच जाने के बाद भी कई क्षेत्रीय राजनीतिक दल अपने दलगत स्वार्थ में लग गए हैं। और तीसरे मोर्चे में शामिल होने से पहले पार्टियां हित साधने पर ध्यान दे रही हैं। लेकिन क्षेत्रीय दलों की उदासीनता से तो यही लग रहा है कि 23 मई तक यह मोर्चा अपना अस्तित्व बचा पाएगा यह सवाल मुंह बाएये खड़ा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *