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कर्तव्य पथ पर गणतंत्र दिवस, लेकिन विपक्ष को तीसरी पंक्ति! क्या यही है ‘नया भारत’ का लोकतांत्रिक प्रोटोकॉल?

नई दिल्ली: देश आज 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा था। कर्तव्य पथ पर सेना की ताकत, संस्कृति की झलक और राष्ट्रगौरव की गूंज थी। लेकिन इस भव्य आयोजन के बीच एक तस्वीर ऐसी भी सामने आई, जिसने लोकतंत्र के सम्मान पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे गणतंत्र दिवस परेड में मौजूद थे, लेकिन दोनों को तीसरी पंक्ति में बैठाया गया। यही तस्वीर अब सोशल मीडिया पर वायरल है और इसी ने केंद्र सरकार को विपक्ष के निशाने पर ला दिया है।


कांग्रेस का सीधा हमला: यह सीट नहीं, सोच का सवाल है

कांग्रेस का कहना है कि यह कोई साधारण बैठने की व्यवस्था नहीं, बल्कि विपक्ष को नीचा दिखाने की सोची-समझी रणनीति है। पार्टी का आरोप है कि संवैधानिक पद पर बैठे विपक्ष के नेताओं के साथ ऐसा व्यवहार लोकतंत्र की आत्मा पर चोट है।

कांग्रेस महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला ने X पर सरकार को घेरते हुए लिखा,
“क्या देश में विपक्ष के नेता के साथ ऐसा बर्ताव किसी शिष्टाचार, परंपरा और प्रोटोकॉल के मानकों को पूरा करता है? यह हीन भावना से ग्रस्त सरकार की हताशा और डर को उजागर करता है।”

कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अगर विपक्ष के नेता को राष्ट्रीय पर्व पर सम्मान नहीं मिलेगा, तो फिर लोकतंत्र में असहमति की जगह कहां बचेगी?


प्रोटोकॉल या राजनीतिक प्रतिशोध?

गणतंत्र दिवस जैसे कार्यक्रमों में बैठने की व्यवस्था केवल कुर्सियों का मामला नहीं होती। यह पद, परंपरा और संवैधानिक गरिमा का प्रतीक होती है। सवाल उठ रहा है कि क्या जानबूझकर विपक्ष को पीछे किया गया?

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि विपक्ष के नेता का स्थान हमेशा प्रमुख होता है। लेकिन इस बार तस्वीर कुछ और ही कहानी कह रही है। कांग्रेस इसे सत्ता की असहजता और विपक्ष के बढ़ते दबाव का नतीजा बता रही है।


बीजेपी की चुप्पी और बढ़ता विवाद

इस पूरे मामले पर सरकार की ओर से अब तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन भाजपा समर्थक इसे प्रशासनिक व्यवस्था बताकर टालने की कोशिश कर रहे हैं।

वहीं विपक्ष का कहना है कि जब प्रधानमंत्री और मंत्रियों के लिए प्रोटोकॉल मायने रखता है, तो विपक्ष के नेता के लिए क्यों नहीं?
क्या लोकतंत्र में सम्मान सिर्फ सत्ता के लिए आरक्षित है?


सोशल मीडिया पर उबाल: ‘लोकतंत्र की तीसरी पंक्ति’ ट्रेंड में

मामला सामने आते ही सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई। कई यूजर्स ने इसे “लोकतंत्र को तीसरी पंक्ति में बैठाने” जैसा करार दिया। कुछ ने सवाल किया कि अगर आज सीट तीसरी पंक्ति में है, तो कल आवाज भी पीछे कर दी जाएगी?

ट्विटर (X) पर तस्वीरों के साथ सवाल उठ रहे हैं—
क्या विपक्ष को हाशिए पर धकेलना ही नए भारत की राजनीति है?


लोकतंत्र का असली इम्तिहान

विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र सिर्फ चुनाव जीतने से मजबूत नहीं होता, बल्कि विपक्ष को सम्मान देने से मजबूत होता है। गणतंत्र दिवस जैसे मौके पर इस तरह के विवाद देश की राजनीतिक संस्कृति पर सवाल खड़े करते हैं।

विपक्ष का कहना है कि यह सिर्फ एक दिन या एक कुर्सी का मामला नहीं, बल्कि आने वाले समय में लोकतांत्रिक संस्थाओं के सम्मान का संकेत है।


निष्कर्ष: कुर्सी छोटी थी या सोच?

कर्तव्य पथ पर आज देश की ताकत दिखाई गई, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठा—
क्या सत्ता में बैठी सरकार विपक्ष को सम्मान देने के लिए तैयार है?
क्या लोकतंत्र सिर्फ बहुमत का नाम है, या असहमति का भी?

यह बहस अब संसद से निकलकर सड़क और सोशल मीडिया तक पहुंच चुकी है। अब देखना यह है कि सरकार इस पर चुप्पी तोड़ेगी या यह मामला भी बाकी सवालों की तरह तीसरी पंक्ति में ही छोड़ दिया जाएगा।

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