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बाढ़ में सीना ताने खड़ा रहा हिमाचल का पंचवक्त्र महादेव मंदिर

देवभूमि है…जहां कुछ देवदूत अब भी बसते हैं।

देवदूतों का चेहरा कैसा होता है, पता नहीं। देवदूत क्‍या आसमान से उतरते हैं, पता नहीं….पर जब नदियां सब कुछ बहा ले जाने को आतुर हों…जब पूरे का पूरा पहाड़ दरक कर अपने साथ घर मकान सब ले जाए…ताश के पत्‍तों की तरह बिखरते घरों, माचिस की डिबिया की तरह बहते ट्रकों और बसों के बीच किसी भी मनुष्‍य की क्‍या शक्ति हो सकती है कि वह सब कुछ निगलने को तैयार नदी से बच जाए? पर देवभूमि है…जहां कुछ देवदूत अब भी बसते हैं। हिमाचल प्रदेश पर आपदा ने जो निशान छोड़े हैं, NDRF

 

देवभूमि और सामुदायिकता

एनडीआरएफ और एसडीआरएफ बाद में आए हैं और उनका अमूल्‍य योगदान है किंतु जब ये नहीं थे तो देवों का सम्‍मान करने वाला हिमाचली समाज किसी की बेटी की शादी से लेकर बीमार को अस्‍पताल पहुंचाने तक में सक्रिय रहता आया है। उसके पीछे की सामुदायिकता का मूल तत्‍व देवत्‍व है। यह उस दर्शन से निकला है कि जो हुआ सो हुआ, अब आगे क्‍या बेहतर हो सकता है। आपदा प्रबंधन का पहला नियम भी यही है कि आपदा के बाद सबसे पहले शोक, भय या चेतनाशून्‍यता से बाहर आएं और फिर जो सकारात्‍मक हो सकता है, उसे करें। ऐसे में उफनती नदी के उस पार से इस ओर को रस्‍सी पकड़ कर आते व्‍यक्ति के लिए जोर से गूंजती ‘शाबाश… शाबाश’ की ध्‍वनियां सकारात्‍मक ऊर्जा का ही संचार करती हैं। उफनते हुए नाले से, डंडे पकड़ कर जब दुल्‍हे को चार लोग उस पार पहुंचाते हैं या किसी गर्भवती को चारपाई पर डाल कर बर्फ लोग अस्‍पताल के लिए चलते हैं तो वे सब परिवार के ही लोग नहीं होते, आसपास के भी होते हैं।

मंडी की एसपी सौम्‍या सांबशिवन जब नदी के साथ लगते भ्‍यूली क्षेत्र में बुजुर्गों को मना रही थी कि कृपया घर छोड़ दीजिए….जान है तो जहान है…तो ऐसा उन्‍हें इसलिए कहना पड़ा क्‍योंकि बुजुर्ग ने कहा था कि मैं नहीं जाऊंगा…घर ही नहीं बचेगा तो हमारे बचने का क्‍या अर्थ है।

देवभूमि का देवत्‍व

इस सारी आपदा में जहां पानी के तेज बहाव ने कई पुलों को नहीं बख्‍शा, घरों को नहीं छोड़ा, छोटी काशी मंडी में स्थित पंचवक्‍त्र महादेव का शिखराकार मंदिर जस का तस खड़ा रहा। अजबर सेन, जो 1527 में मंडी के राजा बने, माना जाता है कि उन्‍होंने इसे बनवाया और बाद में सिद्ध सेन ने अट्ठारहवीं शताब्‍दी में इसका जीर्णोद्धार करवाया। सुकेती और ब्‍यास नदी के संगम स्‍थल पर बने इस मंदिर की एक ईंट भी नहीं उखड़ी। इसके गर्भगृह में भगवान शिव की विशाल पंचमुखी प्रतिमा है जिसमें भगवान शिव के पांच विभिन्‍न रूप अघोरा, ईशान, तत्पुरुष, वामदेव और रुद्र हैं। निसंस्‍देह इसकी स्‍थापत्‍य कला उत्‍कृटतम है। इंटरनेट मीडिया पर लोगों को पंचवक्‍त्र मंदिर को देख कर केदारनाथ त्रासदी में भारी बहाव के बावजूद खड़ी रही भगवान शिव की प्रतिमा का स्‍मरण भी हो आया। हालांकि मंडी शहर में ही 146 वर्षीय विक्‍टोरिया पुल ने भी अपना स्‍थान नहीं छोड़ा। इसे 1877 में राजा विजय सेन ने रामहल तक कार ले जाने के लिए बनवाया था।

इसी प्रकार सिरमौर जिले के रेणुका जी में स्थित बाबा बढोलिया मंदिर भी चर्चा में है जहां मंदिर के पार्श्‍व भाग से बहुत तेज प्रवाह के साथ पानी आया और हर वर्ष आता है पर मंदिर जस का तस खड़ा रहता है। वास्‍तव में आस्‍था ही देवभूमि को देवत्‍व प्रदान करती है। उदाहरण के लिए पूर्व मुख्‍यमंत्री ठाकुर जयराम ने मंडी के बड़ा देव कमरूनाग से प्रार्थना की है कि अब वर्षा रोकी जाए। यह आस्‍था का ही प्रतिबिंब है कि धर्मशाला इंटरनेशनल क्रिकेट स्‍टेडियम में किसी भी मैच से पूर्व देव इंद्रूनाग की पूजा की जाती है और उनसे प्रार्थना की जाती है कि सब ठीक से संपन्‍न हो।

मातृशक्ति भी देवदूत

हिमाचल प्रदेश की हालिया आपदा के दौरान मोर्चे पर महिला शक्ति तैनात रही। पुलिस महानिदेशक संजय कुंडू लंबे अवकाश पर हैं। चंबा का मनोहर लाल हत्‍याकांड हुआ और प्रतिपक्ष ने कानून व्‍यवस्‍था का प्रश्‍न उठाते हुए डीजीपी के न होने की बात कही। सरकार ने सीधे आदेश तो नहीं किए कि वरिष्‍ठतम अधिकारी सतवंत अटवाल को डीजीपी का अतिरिक्‍त कार्यभार दिया जाता है। यह लिखा कि डीजीपी के संज्ञान में लाए जाने वाली फाइलें सतवंत अटवाल को दिखाई जाएं। इस आपदा में सतवंत अटवाल ने दिशानिर्देशन का मोर्चा संभाला जबकि मंडी की एसपी सौम्‍या सांबशिवन, कुल्‍लू की एसपी साक्षी वर्मा, कांगड़ा की एसपी शालिनी अग्निहोत्री और हमीरपुर की एसपी आकृति भी मोर्चे पर तैनात रहीं। ध्‍यान दें तो ब्‍यास कुल्‍लू, मंडी, हमीरपुर होते हुए ही कांगड़ा आती है।

आपदा या करनी का फल

किसी इंटरनेट यूजर ने लिखा था, ‘सरकारी कायार्लयों के नोटिस तो मैनेज हो जाते हैं किंतु इस बार ब्‍यास, रावी और सतलुज जैसी नदियां स्‍वयं कब्‍जे हटाने उतरीं।’ आपदा के क्षणों में हल्‍के ढंग से कही गई यह बात उतनी हल्‍की भी नहीं है। हर होटल या घर नदी के साथ सट कर बनाने का चलन आम हो गया है। सरकारी भूमि पर कब्‍जे का लोभ इन प्रयासों को बल प्रदान करता है। और जिन्‍हें नियम लागू करने होते हैं, वे विशेष परिस्थितियों में न कुछ देखते हैं, न सुनते हैं और न कहते हैं। इसलिए रिवर रिजार्ट का अर्थ नदी के घर पर कब्‍जा करना हो गया है। दूसरा पक्ष विकास का है। जोशीमठ आपदा के बाद एक सीख लेनी चाहिए थी कि विकास का मैदानों जैसा हर ढांचा पहाड़ों के लिए आवश्‍यक नहीं है…उलटे खतरनाक है।

हिमाचल कभी विकास विरोधी नहीं रहा, भाखड़ा बांध, पौंग बांध और कोल बांध इत्‍यादि कुछ उदाहरण हैं। किंतु जिस स्‍थान की विशेषता ही उसका अलग थलग होना या उसकी हरियाली है, वहां भारी मशीनरी पहुंचाना और पहाड़ों की पसलियों में सुराख करना विकास नहीं हो सकता। जिस नदी की आंखों से आंखें मिला कर बात करने की हिम्‍मत नहीं होती थी, उसकी बगल में होटल? उससे सट कर घर? नदियां क्‍यों झेंलेंगेी यह सब? सच यह है कि इस बहाव में या पेड़ बचे हैं या पंचवक्‍त्र जैसे मंदिर।

इसके साथ, अवैज्ञानिक और अंधाधुंध खनन कोई रहस्‍य नहीं है। विधायिका और कार्यपालिका यदि यह सब होने दें तो स्‍वाभाविक है कि अंतिम आसरा नेशनल ग्रीन ट्रिब्‍यूनल ही बचता है। मनुष्‍य की अराजक गतिविधियां आपदाओं को पालती-पोसती रहती हैं…इसलिए आपदा एक दम आती है, यह कहना स्‍वयं को छलना है। यही समय शहरी विकास के वास्‍तविक चिंतन की पड़ताल का भी है। हिमाचल को सतत विकास की आवश्‍यकता है.. किंतु सब खोकर कुछ पाने वाले विकास की नहीं। नियम हैं, अधिनियम हैं…. बस उनके अनुरूप चलने की आवश्‍यकता है।

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