गर्भ से ही देखभाल शुरू होने से शिशु को नहीं होती परेशानी

  • नवजात का वजन जन्म के समय 2.5 किलो या इससे ज्यादा रहना चाहिए
  • कम वजन वाले शिशु (लो बर्थ वेट) को हो सकती है कई प्रकार की समस्याएं

– गर्भवती की नियमित जांच व बेहतर पोषण-आहार से शिशु का स्वास्थ्य रहता है बेहतर

लखीसराय, 4 सितम्बर।

घर में बच्चे की किलकारी हर किसी को अच्छी लगती है, लेकिन अगर बच्चा स्वस्थ न हो तो सभी परेशान हो जाते हैं। खासकर कमजोर और कम वजन वाले बच्चे को लेकर। नवजात के जन्म से ही हर कोई उसके वजन को लेकर चिंतित रहता है। अगर बच्चा सामान्य और उसका वजन ठीक है तो सब चिंता मुक्त रहते हैं। वहीं अगर बच्चे का वजन कम वजन रहता है तो सभी उसके आगे होने वाली समस्याओं को लेकर चिंतित रहने लगते हैं।
सदर अस्पातल, लखीसराय के स्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर रूपा ने बताया, आम तौर पर स्वस्थ्य नवजात का जन्म 37 से 40 सप्ताह के बीच हो जाता है। सामान्य रूप से जन्म के समय एक शिशु का वजन 2.5 किलो से 4 किलो के बीच हो सकता है। हालांकि कुछ का वजन सामान्य से कम हो सकता है। यह महिला के गर्भवती होने से शिशु के जन्म तक उसके पोषण आहार और देखभाल पर निर्भर करता है। उन्होंने बताया अगर जन्म के समय नवजात का वजन 2.5 किलो से कम रहता है, तो उसे कम वजन की श्रेणी में रखा जाता है। कई मामलों में ऐसी समस्या समय से पूर्व जन्म लिए बच्चों के साथ होती है। क्योंकि ऐसे बच्चे को मां के गर्भ में विकसित होने के लिए उचित पूर्ण सयम नहीं मिल पाता। वहीं उचित पोषण और देखभाल के अभाव वाली महिला के बच्चे के साथ भी यह परेशानी हो सकती है।

कम वजन वाले बच्चों को होती है ज्यादा स्वास्थ्य संबंधी परेशानी:
डॉक्टर रूपा के अनुसार स्तनपान कराने में परेशानी के साथ कम वजन वाले बच्चे को भविष्य में कई तरह की शारीरिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है। खासकर शरीर में वसा की कमी के कारण ऐसे बच्चे के लिए अपने शरीर का तापमान सामान्य बनाए रखना मुश्किल होता है। ऐसे में ये जल्द संक्रमण वाले रोगों से प्रभावित हो जाते हैं। साथ ही आंखों की रौशनी, पेट की परेशानी सहित कई समस्याएं हो सकती हैं। वहीं जन्म के एक वर्ष के अंदर कम वजन वाले बच्चों में मृत्यु का खतरा भी बना रहता है।

गर्भ से ही बच्चे का ख्याल रखना है बेहतर:
डॉक्टर रूपा के अनुसार न केवल कम वजन बल्कि स्वस्थ शिशु के जन्म के लिए उसकी देखभाल गर्भ में रहने के दौरान से ही शुरू कर देनी चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि गर्भवती को पोषक आहार और पूर्ण स्वास्थ्य देखभाल की जाए। साथ ही चिकित्सक से मिलते रहना चाहिए। प्रसव से पूर्व गर्भवती की नियमित रूप से जांच से शिशु के विकास की सही जानकारी मिलती रहती है। चिकित्सक गर्भवती के वजन से अंदाजा लगा सकते हैं कि भ्रूण का विकास सही प्रकार से हो रहा है या नहीं।
स्वास्थ्य और पोषण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत:
शिशु के वजन के साथ जन्म के बाद उसे संक्रमण के प्रभाव में आने से बचाने के लिए गर्भवती के स्वास्थ्य और पोषण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। डॉक्टर रूपा कहती हैं कि प्रसव पूर्व गर्भवती की बेहतर देखभाल जन्म से कम वजन शिशुओं की समस्या को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसके साथ ही चिकित्सक से समय-समय पर मां और होने वाले शिशु का स्वास्थ्य जांच आवश्यक है। गर्भवती महिलाओं के खाने में अंकुरित अनाज के साथ दाल, फल, पत्तेदार सब्जियां, साग, फल, जूस और अनाज को शामिल किया जाना चाहिए।

सही देखभाल से शिशु के वजन को ठीक किया जा सकता है:
डॉक्टर रूपा के अनुसार नवजात शिशु के कम वजन को सही आहार व उचित देखभाल के जरिए ठीक किया जा सकता है। न सिर्फ गर्भावस्था के समय, बल्कि जन्म के बाद भी स्तनपान के साथ अगर मां अपने भोजन पर विशेष ध्यान दे तो यह संभव है। इसके साथ ही चिकित्सक से मिलकर बच्चे के स्वास्थ्य के लिए उचित सलाह, जांच और टीकाकरण काफी कारगर साबित होते हैं।

कंगारू मदर केयर है नवजात को बचाने में कारगर:
डॉक्टर रूपा के अनुसार जन्म के समय कम वजन (एक्सट्रीम लो बर्थ वेट) वाले बच्चों को बेहतर देखभाल के लिए कंगारू मदर केयर बहुत कारगर सिद्ध हुआ है। कंगारू मदर केयर के तहत बच्चे को मां के सीने से चिपका कर रखा जाता है, ताकि मां की शरीर की गर्माहट बच्चे तक पहुंच सके। मां का तापमान शिशु तक पहुंचने से उसका तापमान स्थिर रहता है और उसे बुखार होने की संभावना काफी हद तक कम हो जाती है। वहीं आशा, आंगनबाड़ी और एनएनएम कार्यकर्ता द्वारा नवजात के सामान्य होने तक उसकी स्वास्थ्य गतिविधियों पर नजर रखी जाती है।

पोषण अभियान कार्यक्रम से भी मिलेगा बल:
वहीं लखीसराय के जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉक्टर अशोक कुमार भारती के अनुसार जिले में पोषण अभियान अंतर्गत ‘पोषण माह’ का आयोजन हो रहा है। 30 सितंबर तक चलने वाले इस कार्यक्रम के तहत कई प्रकार की स्वास्थ्य गतिविधियां आयोजित होंगी। इस दौरान भी कुपोषित बच्चों की पहचान, स्तनपान को बढ़ावा और गृह आधारित नवजात की देखभाल योजना पर कार्य होगा। हालांकि इससे पूर्व भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता द्वारा गर्भवती, माता व नवजात शिशु के देखभाल, कम वजन वाले बच्चों की निगरानी और समस्या होने पर एएनएम को सूचना देने आदि का कार्य किया जाता रहा है।

बच्चे का वजन जन्म से कम हो तो इन बातों का रखें ख्याल:

  • स्तनपान पर विशेष ध्यान दें। 6 माह तक केवल स्तनपान कराएं।
  • चिकित्सक से बच्चे का नियमित रूप से स्वास्थ्य जांच कराते रहें।
  • वजन व अन्य चीजों को लेकर बच्चे का विकास के चार्ट बनवा लें।
  • छह माह बाद चिकित्सक की सलाह पर ठोस खाद्य पदार्थों को आहार में शामिल करें।
  • मां के दूध में सभी तरह के पोषक तत्व होते हैं, इसलिए वह भी अपने खानपान का विशेष रूप से ख्याल रखे।

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