शिशु-मृत्यु दर में सुधार लाने में आशा का अहम योगदान

• एसआरएस की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2010 में शिशु-मृत्यु दर 48 थी, जो 2018 में 32 हो गई• अस्पताल से लेकर घर और समुदाय स्तर पर नवजात पर आशा रखती हैं नजर• नवजात के पोषण, टीकाकरण, शारीरिक व मानसिक विकास की करतीं हैं निगरानी• चार चरणों में गृह भ्रमण और स्वास्थ्य रिपोर्ट के आधार पर इन्हें दी जाती है प्रोत्साहन राशि

खगड़िया, 29 अगस्त।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन कार्यक्रम के तहत देश में शिशु-मृत्यु दर को कम करना एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है। सरकार और स्वास्थ्य विभाग की सकारात्मक पहल और शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम योजना के बेहतर क्रियान्वयन का ही परिणाम है कि पिछले कुछ वर्षों में देश में शिशु-मृत्यु दर में काफी कमी आई है। सैंपल रेजिसट्रेशन सर्वे एसआरएस) की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2010 में राज्य की शिशु मृत्यु दर 48 ( प्रति हजार जीवित जन्म) थी, जो वर्ष 2018 में घट कर 32( प्रति हजार जीवित जन्म) हो गयी. इसमें 79 प्रतिशत नवजात की मृत्यु जन्म के चार सप्ताह के अंदर हो जाती है। इसमें कम वजन वाले बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा रहती है। सामान्य वजन की तुलना में कम वजन वाले बच्चों का जल्द संक्रमण के प्रभाव में आने, उनमें  मानसिक विकास में कमी तथा कुपोषण का प्रभाव अधिक होना शिशु मृत्यु का मुख्य कारण बनता है। इसलिए ऐसे नवजात बच्चों की ससमय पहचान कर उनकी देखभाल और उचित इलाज की व्यवस्था कर शिशु-मृत्यु दर में कमी लाई जा रही है। इस कार्य में आशा कार्यकर्ताओं का अहम योगदान है। ये गृह स्तर पर नवजात के स्वास्थ्य पर नजर रखते हुए उनके विकास के लिए कार्य कर रही हैं।आशा व नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए उठाए जा रहे कदम:जन्म के समय सामान्य से कम वजन वाले नवजात व शिशुओं की नियमित जांच व पहचान के लिए मुख्य रूप से चार कदम उठाए जा रहे हैं। पहले कदम के रूप में नवजात शिशु जिनका जन्म अस्पताल या घर में हुआ है, उनकी वजन की जाँच नर्सिंग स्टाफ तथा आशा द्वारा सुनिश्चित करना है। दूसरे पहल के रूप में कम वजन वाले नवजात को चिन्हित कर उनकी जानकारी संबंधित प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी को देना सुनिश्चित कराना है, ताकि चिकित्सा पदाधिकारी अपने स्तर पर संबंधित आशा को कम वजन वाले शिशुओं की सुधारात्मक जांच हेतु आदेश दे सकें। तीसरे और चौथे पहल के तहत प्रत्येक कम वजन वाले नवजात, जिनकी जांच आशा द्वारा की गई है, उनकी समीक्षा एएनएम की साप्ताहिक बैठक तथा प्रत्येक माह में आशा दिवस पर प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी द्वारा की जानी है।तीसरे, छठे, नौवें और बारहवें माह में आशा द्वारा किया जाता है फॉलोअप:न केवल सामान्य प्रसव बल्कि एसएनसीयू (स्पेशल न्यू बोर्न केयर यूनिट) से डिस्चार्ज शिशुओं का फॉलोअप आशा द्वारा किया जाता है। विशेष रूप से कम वजन वाले शिशुओं की बेहतर देखभाल सुनिश्चित करना इनके जिम्मे है। इसके लिए तीसरे, छठे, नौवें और बारहवें माह में आशा द्वारा इनके फॉलो-अप किए जाने का प्रावधान है। इसका लाभ यह होता है कि शिशु के स्वास्थ्य की स्थिति से आशा अवगत रहती हैं। वहीं शिशु के बीमार रहने पर अस्पताल रेफर करती हैं। इस फॉलोअप कार्य के लिए आशा को प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है।गृह भ्रमण व बेहतर कार्य के लिए आशा को दी जाने वाली प्रोत्साहन राशि:बच्चे के स्वास्थ्य में सकारात्मक परिणाम सुनिश्चित होने तक आशा द्वारा नवजात के जन्म के बाद और एसएनसीयू से डिस्चार्ज शिशु का चार अनुवर्तन(फॉलो-अप) किया जाता है। इसके लिए आशा को प्रोत्साहन के रूप में 50 रुपए प्रति मुलाकात की दर पर कुल चार बार मुलाकात के पश्चात एकमुश्त 200 रूपये दिए जाते हैं। आशा द्वारा चार अनुवर्तन शिशु के जन्म के तीसरे, छठे, नवें एवं 12वें माह में गृह भ्रमण कर किया जाता है। गृह भ्रमण के दौरान मुख्य रूप से पोषण, टीकाकरण, शारीरिक व मानसिक विकास की निगरानी के साथ उचित सलाह भी देनी है। साथ ही गंभीर रूप से बीमार बच्चों को रेफर भी करना है। वहीं एसएनसीयू से डिस्चार्ज शिशु का निर्धारित माह में फैकल्टी फॉलोअप हेतु शिशु को एसएनसीसू/नीकू में रेफर करना सुनिश्चित करना है।आशा के लिए प्रोत्साहन राशि के लिए यह दायित्व निभाना है जरूरी:• यह सुनिश्चित कर लिया गया है कि मातृत्व एवं बाल रक्षा (एमसीपी) कार्ड में जन्म के समय बच्चे का वजन दर्ज किया गया है।• यह सुनिश्चित कर लिया गया है कि बच्चे को एक वर्ष तक पूर्ण प्रतिरक्षण दिया गया हो और उसे एमसीपी कार्ड में दर्ज किया गया है।• यह सुनिश्चित कर लिया गया है कि नवजात के जन्म का पंजीकरण कर लिया गया है।• नवजात शिशु प्रसव के बाद एक वर्ष से जीवित है, और उसका स्वास्थ्य बेहतर है।• आशा कार्यकर्ता का मॉड्यूल 6 एवं 7 में प्रशिक्षित होना भी जरूरी है।• आशा द्वारा भरा गया प्रपत्र आशा फैसिलिटेटर/एएनएम द्वारा सत्यापित है।

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